NIRMALA JAIN

हिन्दी की जानी-मानी आलोचक। निर्मला जैन का जन्म सन् 1932 में दिल्ली के व्यापारी परिवार में हुआ। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण आरम्भिक जीवन संघर्षपूर्ण रहा। इसके बावजूद उन्होंने दिल्ली में ही शिक्षा पूरी की और वर्षों कत्थक गुरु अच्छन महाराज (बिरजू महाराज के पिता) से नृत्य की शिक्षा प्राप्त की। विवाह से पहले बी.ए. तक और विवाह के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से ही उन्होंने एम.ए., पीएच.डी. और डी. लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। लेडी श्रीराम कॉलेज (1956-70) और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग (1970-1996) में अध्यापन करके सेवानिवृत्त होने के बाद भी, वे विशेष आमन्त्रित रूप से दस वर्ष तक अध्यापन करती रहीं। इस दौरान वे हिन्दी विभाग की अध्यक्ष (1981-84) और अनेक वर्ष तक दक्षिण-परिसर में विभाग की प्रभारी प्रोफेसर रहीं। अध्यापन के दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अनेक महत्त्वपूर्ण आलोचना कृतियों की रचना की और प्रसिद्ध कृतियों के अनुवाद किए। महादेवी और जैनेन्द्र की रचनावलियों के अतिरिक्त कई पुस्तकों का संचयन और सम्पादन भी किया। इन मौलिक, अनूदित और सम्पादित रचनाओं की संख्या तीस से अधिक है। साहित्येतर कलाओं के प्रति रुझान और वाग्मिता निर्मला जैन के व्यक्तित्व का अतिरिक्त आयाम है। साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शिरकत के लिए वे निरन्तर देश-विदेश की यात्रा करती रहीं। साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें अनेक स्वदेशी-विदेशी संस्थाओं ने सम्मानित किया। निर्मला जैन एक ऐसा सुपरिचित नाम है जिन्होंने अपनी वस्तुनिष्ठ आलोचना दृष्टि और बेबाक अभिव्यक्ति से हिन्दी के पुरुष-प्रधान आलोचना-परिदृश्य में उल्लेखनीय जगह बनाई है। उनके अनेक शिष्य महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं। खास बात यह है कि आज भी वे पूरी लगन और निष्ठा से अध्ययन और रचना-कर्म में संलग्न हैं और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान दे रही हैं।

NIRMALA JAIN