PREM JANMJAY

वर्तमान दौर की सर्वाधिक चर्चित व्यंग्य विधा के संवर्धन एवं सृजन के क्षेत्र में प्रेम जनमेजय का विशिष्ट स्थान है। व्यंग्य को एक गम्भीर कर्म तथा सुशिक्षित मस्तिष्क के प्रयोजन की विधा मानने वाले प्रेम जनमेजय ने हिन्दी व्यंग्य को सही दिशा देने में सार्थक भूमिका निभाई है। परम्परागत विषयों से हटकर प्रेम जनमेजय ने समाज में व्याप्त आर्थिक विसंगतियों तथा सांस्कृतिक प्रदूषण को चित्रित किया है। व्यंग्य के प्रति गम्भीर एवं सृजनात्मक चिन्तन के चलते ही उन्होंने सन् 2004 में व्यंग्य केन्द्रित पत्रिका ‘व्यंग्य यात्रा’ का प्रकाशन आरम्भ किया। इस पत्रिका ने व्यंग्य विमर्श का मंच तैयार किया। विद्वानों ने इसे हिन्दी व्यंग्य साहित्य में ‘राग दरबारी’ के बाद दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना माना है। इनके लिखे व्यंग्य नाटकों को भी अपार ख्याति मिली है। प्रकाशित कृतियाँ: राजधानी में गँवार, बेशर्ममेव जयते, पुलिस! पुलिस!, मैं नहीं माखन खायो आत्मा महाठगिनी, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ, शर्म मुझको मगर क्यों आती!, डूबते सूरज का इश्क, कौन कुटिल खल कामी, मेरी इक्यावन श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग, संकलित व्यंग्य, कोई मैं झूठ बोलया, लीला चालू आहे! (व्यंग्य संकलन); दो व्यंग्य नाटक (नाटक); मेरे हिस्से के नरेन्द्र कोहली (संस्मरणात्मक कृति)। सम्पादन: प्रसिद्ध व्यंग्य पत्रिका ‘व्यंग्य यात्रा’ के सम्पादक एवं प्रकाशक ‘गगनांचल’ में सम्पादकीय सहयोग, बीसवीं शताब्दी उत्कृष्ट साहित्य: व्यंग्य रचनाएँ। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दी हास्य व्यंग्य संकलन’ श्रीलाल शुक्ल के साथ सहयोगी सम्पादक। हिन्दी व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य, मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचना, श्रीलाल शुक्ल: विचार विश्लेषण एवं जीवन, व्यंग्य सर्जक: नरेन्द्र कोहली, उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाएँ, दिविक रमेश: आलोचना की दहलीज पर, हँसते हुए रोना, हिन्दी व्यंग्य का नावक: शरद जोशी। सम्मान / पुरस्कार: दुष्यन्त कुमार अलंकरण, पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी सम्मान, पं.बृजलाल द्विवेदी साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान, शिवकुमार शास्त्री व्यंग्य सम्मान, व्यंग्यश्री सम्मान, कमला गोइनका व्यंग्य भूषण सम्मान, हरिशंकर परसाई स्मृति पुरस्कार, हिन्दी अकादमी साहित्यकार सम्मान, हिन्दी निधि तथा भारतीय विद्या संस्थान; त्रिनिडाड एवं टुबैगो आदि।

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