DHIRU BHAI SETH

धीरुभाई शेठ एक ऐसे दुर्लभ बौद्धिक मानस का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके केंद्रीय स्वर में एक अस्वीकार की ध्वनि है । समाज विज्ञान और सामाजिक यथार्थ के प्रचलित रिश्तों को गहराई से प्रश्नाकित करने वाला यह विपुल अस्वीकार अपने मूल में सकारात्मक है । अपनी इसी खूबी के कारण ही इसके गर्भ से समाज और उसकी पद्धति की रचनात्मक आलोचना निकलती है। इस आलोचना का दायरा बहुत बड़ा है जिसके एक सिरे पर अगर हमारी राजनीतिक आधुनिकता और जातिप्रथा के बीच के लेन-देन का अध्ययन है, तो उसके दूसरे सिरे पर उदारतावादी लोकतंत्र और भूमंडलीकरण के अंत:संबंधों की निष्पत्तियों का खुलासा है । इन दोनों सिरों के बीच राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया और उसकी उलझनें, सेकुलरवाद का विवेचना, आरक्षण नीति की अनिवार्यता और उसमें आई विकृतियों के निराकरण और गैर-पार्टी राजनीति के चमकदार सूत्रीकरण मौजूद हैं । इस अनूठे रचना-संसार को एक सूत्र में बाँधने की भूमिका खामोशी से की गई उस आजीवन विकल्प साधना ने निभाई है जिसके आधार में धीरूभाई की शख्सियत है ।

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