हिन्दी साहित्य का आदिकाल

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5000-406-7

लेखक:

Pages:176

मूल्य:रु125/-

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हिंदी साहित्य के इतिहास की पहली सुसंगत और क्रमबद्ध व्याख्या का श्रेय अवश्य आचार्य रामचंद्र शुक्ल को जाता है, मगर उसकी कई गुम और उलझी हुई महत्त्वपूर्ण कड़ियों को खोजने और सुलझाने का यश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का है। अगर द्विवेदी न होते तो हिंदी साहित्य का इतिहास अभी तक अपनी व्याख्या संबंधी कई एकांगी धारणाओं का शिकार रहता और उसकी परंपरा में कई छिद्र रह जाते। इतिहास के प्रति एक अन्वेषक और प्रश्नाकुल मुद्रा, परंपरा से बेहद गहरे सरोकार तथा मौलिक दृष्टि के मणिकांचन योग से बना था। हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक व्यक्तित्व और उन्होंने साहित्येतिहास और आलोचना को जो भूमि प्रदान की, हिंदी की आलोचना आज भी वहीं से अपनी यात्रा शुरू करती दिखती है। खास तौर पर हिंदी साहित्य के आदिकाल की पूर्व व्याख्याएँ उन्हें शंकित बनाती रहीं और अपने व्यापक चिंतन से अपनी शंकाओं को उन्होंने साबित किया। हिंदी साहित्य के आदिकाल के मूल्यांकन से जुड़े उनके व्याख्यान आज भी हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। जब भी हिंदी साहित्य के इतिहास और उनकी परंपरा की बात की जाएगी, ये व्याख्यान एक प्रकाश-स्तंभ की-सी भूमिका निभाते रहेंगे।

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DR. HAZARIPRASAD DVIVEDI

DR. HAZARIPRASAD DVIVEDI बचपन का नाम बैजनाथ द्विवेदी। श्रावण शुक्ल एकादशी संवत् 1964 (1907ई.) को जन्म। जन्म-स्थान आरत दुबे का छपरा, ओझबलिया, बलिया, उत्तर प्रदेश। संस्कृत महाविद्यालय, काशी में शिक्षा। 1929 ई. में संस्कृत साहित्य में शास्त्राी और 1930 में ज्योतिष में शास्त्राचार्य। 8नवंबर, 1930 से 1950 तक हिंदी शिक्षक के रूप में शांतिनिकेतन में अध्यापन। लखनउ$ विश्वविद्यालय में सम्मानार्थ डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर की उपाधि 1949। सन् 1950 में काशी हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के पद पर नियुक्त। ‘विश्वभारती’का साहित्यिक विश्वविद्यालय की एक्जीक्ूटिव काउंसिल के सदस्य 1950-53। काशी नागरी प्रचारिणी सभा, के अध्यक्ष 1952-53। नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के हस्तलेखों की खोज (1952)। सन् 1957 में ‘पद्म-भूषण’। 1960-67 के दौरान, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में हिंदी के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष। सन् 1962 में पश्चिम बंग साहित्य अकादेमी द्वारा टैगोर पुरस्कार। 1967 के बाद पुनः काशी हिंदू विश्वविद्यालय में। 1974 में केंद्रीय सहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत। जीवन के अंतिम दिनों में ‘उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान’ के उपाध्यक्ष रहे। 19 मई, 1979 में देहावसान।

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