हिन्दी साहित्य का इतिहास और उसकी समस्याएँ

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5229-402-2

लेखक:

Pages:548

मूल्य:रु295/-

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हिन्दी साहित्य का इतिहास और उसकी समस्याएँ

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'हिन्दी साहित्य का इतिहास और उसकी समस्याएँ’ कृति की प्रस्तुति तथ्यों के विवरणों तथा विशेषताओं तक ही सीमित नहीं है। लेखक ने सम्पूर्णतः यह चेष्टा की है कि समसामयिक इतिहास के प्राप्त तथ्यों के आधार पर रीतिकाल एवं आधुनिक काल से जुड़ी उन विशिष्ट समस्याओं पर विचार किया जाय जो साहित्य के नये तथ्यों एवं उनके सापेक्ष्य में उत्पन्न नयी समस्याओं से सम्बद्ध हैं। रीतिकाल के आधुनिक युग के विशेषज्ञों द्वारा जो चिन्तन प्रस्तुत किये गये, अब नये तथ्यों के प्रकाश में उस विवेचन में पुरानापन सा दिखाई पड़ने लगा है। ठीक यही बात पुराने इतिहास ग्रन्थों में आधुनिक काल के साहित्य के विवेचन के सन्दर्भ में भी कही जा सकती है। आधुनिकता की व्याख्या हिन्दी साहित्य में अंग्रेज़ी सत्ता के दबाव से उत्पन्न बदलाव से विवेचित की गयी है, किन्तु यह आधुनिकता वैश्विक औद्योगिक परिवर्तन का प्रतिफल है, जिसकी शुरुआत हिन्दी साहित्य में फोर्ट विलियम कॉलेज कलकत्ता से होती है और यह बिहार होते हुए। उत्तर भारत में प्रवेश करती है। जबकि हिन्दी साहित्य में इस बात का श्रेय भारतेन्दु और बनारस को दिया जाता है। भारतेन्दु ने स्वयं कलकत्ता से अपने को जोड़कर यह आधुनिकता हिन्दी साहित्य में ले आने की चेष्टा की। हिन्दी की पहली खड़ी बोली कविता अयोध्या प्रसाद खत्री के सम्पादन में इंग्लैंड में छपी थी, जिसका उल्लेख करना लोग भूल गये। तब से लेकर आज तक के संवैधानिक बदलावों के फलस्वरूप हिन्दी साहित्य की गद्य और पद्य, दोनों धाराओं में जो बदलाव और समस्याएँ सामने आयीं; उनकी खोज, मूल्यांकन और विश्लेषण इस कृति का मन्तव्य है।

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