अन्तिम दशक की हिन्दी कहानियाँ संवेदना और शिल्प

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-544-6

लेखक:डॉ.नीरज शर्मा

Pages:

मूल्य:रु395/-

Stock:Out of Stock

Rs.395/-

Details

‘अन्तिम दशक की हिन्दी कहानी: संवेदना और शिल्प’ नीरज शर्मा की पहली आलोचना-कृति है। आलोच्य युग की हिन्दी कहानी की गति-प्रगति को देखते हुए कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ अपने व्यापक सामाजिक सरोकारों के चलते एक नये तरह की मानवीय संवेदना से जुड़ी दिखाई देती हैं और इस अर्थ में वह अपना विशिष्ट महत्त्व रखती हैं। नीरज शर्मा ने अपनी इस पुस्तक में यह दिखलाने की कोशिश की है कि ये कहानियाँ अपने समय, समाज एवं उसमें रहने वाले व्यक्तियों-आम एवं खास दोनों-की गहरी पड़ताल तो करती ही हैं साथ ही जीवन एवं जगत् की, व्यक्ति एवं समाज की तथा व्यवस्था की अनेकानेक स्थितियों-परिस्थितियों एवं समस्याओं को प्रस्तुत करते हुए उनके कारणों को भी खोजने का प्रयास करती हैं। हिन्दी कहानी में आने वाले बदलाव के विविध बिन्दुओं की ओर संकेत करते हुए नीरज शर्मा ने यह दिखलाने की कोशिश की है कि अन्तिम दशक की कहानियों में उनका युग-परिवेश और युग-परिस्थितियाँ ही जीवन्त हुई हैं लेकिन ये कहानियाँ सिर्फ यथार्थ की प्रस्तुति मात्रा नहीं हैं बल्कि संवेदना और शिल्प के धरातल पर हस्तक्षेप की प्रक्रिया से गुजरती भी दिखाई देती हैं। नीरज शर्मा ने अपनी गहरी सूझबूझ और आलोचना-दृष्टि का परिचय देते हुए संवेदना और शिल्प के सैद्धांतिक पहलू पर विचार करने के साथ ही उनके कारक तत्त्वों की भी सूक्ष्म पड़ताल की है और उन्हीं के आलोक में संवेदना के उन नये धरातलों को उद्घाटित किया है जो इस दौर की कहानियों को अलग पहचान देते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि अन्तिम दशक की कहानियाँ समय एवं समाज की चिन्ता को, व्यक्ति एवं व्यवस्था की असलियत को तथा समसामयिक अनेकानेक संदर्भों को गहराई से पकड़ती हैं। समाज हो, राजनीति हो, धर्म हो, सांस्कृतिक विघटन का सवाल हो, बौद्धिक भटकाव की स्थितियाँ हों या कि ‘दलित विमर्श’ एवं ‘स्त्राी-विमर्श’ से जुड़े सवाल हों सबको इस दौर की कहानियाँ व्यापक संदर्भों में, बहुआयामी रूपों में प्रस्तुत करती हैं। अस्तु, संवेदना के धरातल पर अन्तिम दशक की हिन्दी कहानियाँ सीधे मनुष्य से जुड़ती हैं या मनुष्य के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं। संवेदना के बहुआयामी पक्ष को नीरज शर्मा ने विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करते हुए समकालीन कहानी की नयी पहचान को भी रेखांकित किया है। और इस अर्थ में यह आलोचना-कृति समकालीन कहानी को जानने-समझने के लिए दस्तावेज के समान है। नीरज शर्मा को उनकी इस प्रथम आलोचना-कृति के लिए बधाई इस आशा के साथ कि यह तो प्रस्थान-बिन्दु है। वे और भी ऊँची से ऊँची मंजिल की ओर कदम बढ़ायेंगे और हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान कायम करेंगे।

Additional Information

No Additional Information Available

About the writer

DR. NEERAJ SHARMA

DR. NEERAJ SHARMA 13 जुलाई, 1977 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से स्नातक (आनर्स) एवं स्वर्ण पदक के साथ हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर राजस्थान से पीएच. डी. की उपाधि। सम्प्रति ‘बैरकपुर राष्ट्रगुरु सुरेन्द्रनाथ महाविद्यालय, कोलकाता’ (प. बंगाल) में असिस्टेंट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग के रूप में कार्यरत। अपभ्रंश, आधुनिक हिन्दी साहित्य एवं भारतीय तथा पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त पर शोध-आलेख प्रकाशित। अनेक राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में सहभागिता। अपभ्रंश, आधुनिक हिन्दी कथा-साहित्य, भाषा विज्ञान एवं अनुवाद विज्ञान में विशेषज्ञता। सम्पर्क: सी-4, एम-1, 501, सी.एम.डी.ए. नगर, बैरकपुर, कोलकाता (प. बंगाल), 700124

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality