आधुनिक हिन्दी स्वच्छंदतावादी कविता में सार्वभौमिकता

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-341-6

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मानव स्वभाव से संबद्ध होने के कारण स्वच्छंदतावाद एव सार्वभौमिक और सार्वकालिक प्रवृत्ति है, जो देश और काल के अनुसार जातिगत विशेषताओं को लेकर प्रकट होती है। आधुनिक हिंदी का स्वच्छंदतावादी काव्य तद्युगीन विशेष परिस्थितियों की उपज था। नवजागरण और पूर्ण-पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान तथा संस्कृतियों के मिलने के फलस्वरूप जिन नवीन विचारों, भावों, अनुभूतियों और नयी चेतना ने जनमानस को आंदोलित किया था, उन्हीं की सशक्त अभिव्यक्ति इस काव्य में हुई है। प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी वर्मा ने एक और तद्युगीन जीवन में घटित परिवर्तनों और नवीनता के संदर्भ में युगीन राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना को स्वर दिया तो दूसरी ओर युग की सीमाओं को पहचान कर उनसे ऊपर उठ कर शाश्वत मूल्यों की खोज की। उनके काव्य में युग सापेक्ष सत्य के साथ-साथ युग निरपेक्ष सत्य की भी अभिव्यक्ति हुई है। युग निरपेक्ष सत्य एकता का सत्य है, मानव-कल्याण का सत्य है। सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक मूल्यों की अभिव्यक्ति के कारण ही इन कवियों के काव्य का स्वरूप सार्वभौमिक हैं प्रस्तुत पुस्तक में आधुनिक हिंदी के स्वच्छंदतावादी काव्य के इस सार्वभौमिक स्वरूप पर प्रकाश स्वच्छंदतावाद की सार्वभौमिकता के परिप्रेक्ष्य में डाला गया है।

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TANUJA MAJUMDAR

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