भारतीय काव्य में सर्वधर्म समभाव

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ISBN:81-7055-808-5

लेखक:डॉ. नगेन्द्र

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मूल्य:रु325/-

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सामान्यत: तो प्रत्येक युग में सामाजिक-राजनीतिक जीवन की सुख-शांति के लिए सर्वधर्म समभाव की संकल्पना अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है, परंतु हमारे देश के संविधान की भूमिका में भारत के लिए प्रयुक्त ‘सेक्यूलर स्टेट’ पद के साथ संपृक्त हो जाने के कारण यह विशेष चर्चा का विषय बन गयी है। स्वतंत्र भारत के भाग्यविधाताओें का यह पवित्र संकल्प था कि यहां किसी भी प्रकार के जातीय-प्रजातीय तथा सांप्रदायिक भेदभाव के लिए स्थान नहीं होना चाहिए-और प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक मान्यताओं तथा नीति-नियमों का अनुपालन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। चूंकि मूल संविधान का आलेखन अंग्रेजी भाषा में हुआ था, अतः उसके निर्माताओं ने पाश्चात्य लोकतंत्र आदि के प्रलेखों से खोज कर ‘सेक्यूलर’ शब्द का प्रयोग किया।

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DR. NAGENDRA

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