अन्तिम दो दशकों का हिन्दी-साहित्य

Format:Hard Bound

ISBN:81-7055-995-2

लेखक:मीरा गौतम

Pages:

मूल्य:रु495/-

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सहस्राब्दी के आरम्भ में यह प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों का साहित्यिक चरित्र क्या होगा। गहन दृष्टि से देखें तो हिन्दी-साहित्य 1857 के संक्रान्तिपूर्ण क्षणों में आंखें खोलता है। हिन्दी-साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने उद्देश्यों में स्पष्ट है। इस साहित्य का भाव और कलापक्ष अपने महत्व के अनुरूप अपनी आकृति और प्रकृति से ताल-मेल करता हुआ चलता है। राष्ट्रीय आन्दोलन में उसकी भूमिका साहित्य के स्तर दायित्व को पूरा करती हुई दीखती है। इय दृष्टि से हिन्दी-साहित्य को तीन बिन्दुओं से परखा जा सकता है-(1) आजादी के पूर्व, (2) आजादी के समय, (3) आजादी के बाद का साहित्य। आजादी के पूर्व हिन्दी-साहित्य का मुख्य लक्ष्य स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ-साथ सामाजिक जन-जागृति में महत्त्वपूर्ण समस्याओं से जुड़ा हुआ था। विश्वमहायुद्धों का प्रभाव, अंग्रेजों का दमन, सामाजिक आपदाएं, समस्त अशिक्षा के बीच अनेक विचारकों के दर्शन इसे प्रभावित करते हैं। इसी के साथ पश्चिमी साहित्य का स्वछन्दतावाद, मार्क्सवाद, अस्तित्ववाद जैसे बाह्य दर्शन हिन्दी-साहित्य के सम्पूर्ण परिदृश्य में घुसपैठ करते हुए दिखाई देते हैं।

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MEERA GAUTAM

MEERA GAUTAM शिक्षा बिजनेस मॅनेजमेंट की लेकिन मानस एक साहित्यिक लेखक का - हरीश भिमानी आवाज़ की दुनिया में आये विज्ञापनों के जरिये और टी.वी. सीरियल महाभारत में ‘समय’, भगवतगीता, गायत्री को स्वर देकर घर-घर में जानी-पहचानी आवाज बन गये। और वही आवाज उन्हें ले गयी दुनिया-भर के देशों में अनेक जानेमाने भारतीय कलाकारों के कार्यक्रमों का संचालन करने।

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