बात का बतंगड़

Format:Hard Bound

ISBN:81-7055-444-6

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बात का बतंगड़

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मानव मन बड़ा उलझन भरा है। इसमें शुभ और अशुभ प्रवृत्तियाँ सदा से रहती हैं और सदा रहेंगी। यह संसार सदा से इन प्रवृत्तियों के संघर्ष में उलझा रहा है दुनिया में चाहे जितने सन्त, महात्मा, महापुरुष पैदा हों, आदर्शों का अम्बार लगे, लोभ, लालच, स्वार्थ, राग, द्वेष की प्रवृत्तियाँ ख़त्म नहीं होंगी। ये प्रवृत्तियाँ खुलकर सामने नहीं आतीं। हमारे कार्य व्यवहार में ये प्रवृत्तियाँ आदर्शों, सिद्धान्तों, मतमतान्तरों, वादों का रूप धारण कर सामने आती हैं। कभी-कभी धर्म के नाम पर अन्धविश्वासों का मायाजाल इन प्रवृत्तियों के रूप में सामने आता है। हर झूठ को सत्य का लबादा ओढ़ना पड़ता है। यह भ्रष्टाचार शिष्टाचार के रूप में प्रकट होता है और इस करनी और कथनी, सिद्धान्त और व्यवहार को जब भी बेनकाब करना आवश्यकता बन जाती है, तब अनिवार्यतः व्यंग्य प्रकट होता है। इस दृष्टि से व्यंग्य का लेखन बड़ा कठिन और चिन्तापूर्ण कार्य है। व्यंग्य लेखक की दृष्टि सामाजिक दायित्वों के प्रति जब तक स्पष्ट नहीं होती, वह व्यंग्य-लेखन के प्रति न्याय नहीं कर सकता। इन सब मुद्दों पर विचार करने पर यह भी स्पष्ट होता है कि व्यंग्य लेखन अनुभव की गहराई माँगता है। व्यंग्यकार के रूप में श्री विनोद सेमवाल के ये व्यंग्य कितना न्याय करते हैं, यह तो पाठक तय करेंगे किन्तु इन व्यंग्यों में सामाजिक दायित्वों का बोध बराबर रचा बसा है। -प्रस्तावना से

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VINOD SEMVAL

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