हंस के विमर्श-1

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-918-5

लेखक:राजेन्द्र यादव

Pages:

मूल्य:रु1500/-

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Details

‘हंस’ साहित्यिक पत्राकारिता की गौरवशील परम्परा में खुद को स्थापित कर पाया है तो इसका बड़ा कारण ऐतिहासिक परिवर्तनों के इस नित सर्जित-विसर्जित दौर में महत्त्वपूर्ण और रोचक की पहचान कर पाने की इसकी क्षमता रही। इस दौर के साहित्य की कई लोगों ने अस्मितामूलक साहित्य के रूप में पहचान की है और इस साहित्य को हाशिये से केन्द्र में ला खड़ा करने में सर्वाधिक सहयोगी भूमिका ‘हंस’ की मानी जानी चाहिए। खास कर दलित-विमर्श और स्त्राी-विमर्श को हिन्दी की मुख्य धारा की बहसों का केन्द्र बना देने में पत्रिका के रूप में सबसे बड़ा योगदान ‘हंस’ का माना जाएगा। ‘हंस’ ने बहसों-विवादों में पक्ष लेने से कभी गुरेज नहीं किया। ‘हंस’ ने साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक सीमाओं को हमेशा छद्म माना और अपने पाठक वर्ग की निर्भ्रान्त पहचान की। हिन्दी क्षेत्रा के छोटे शहर-कस्बों, गाँवों के लोग इसके केन्द्र में रहे। ‘हंस’ ने अपने पाठक वर्ग के लिए प्रवचनकर्ता की भूमिका निभाने से परहेज करते हुए उनसे सार्थक और जुझारू बहस में भिड़ने का जिम्मा सँभाला। ‘हंस’ की बहसों की सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें बहस को एक अंक में समेटने की कोई जल्दी नहीं दिखती। एक बहस चार-पाँच महीनों तक जारी रहती है। लम्बी बहस विभिन्न अंकों में बँट जाने से लम्बी नहीं लगती, और अधिकांश पक्ष तात्कालिक प्रतिक्रियावाले होने से बच जाते हैं। एक और फायदा यह होता है कि पाठकों को अगले अंकों का इन्तजार रहता है। पर कुछ बहसों में यह भी देखा जा सकता है कि लम्बे समय तक चलनेवाली बहस अपने मूल मुद्दे को छोड़कर कहीं और चली गयी है। जो भी हो, लम्बी बहसों के कारण ही कई मुद्दे केन्द्र में आ सके और कई सवालों पर हिन्दी-समाज का माइंड-सेट बदलने में सफल हो पाए हैं।

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About the writer

ED. RAJENDRA YADAV

ED. RAJENDRA YADAV राजेन्द्र यादव जन्म : 28 अगस्त, 1929 शिक्षा : एम.ए. (आगरा)। प्रथम रचना : प्रतिहिंसा ('चांद' के भूतपूर्व सम्पादक श्री रामरखसिंह सहगल के मासिक 'कर्मयोगी' में) 1947 में। प्रकाशित रचनाएँ : सारा आकाश, उखड़े हुए लोग, शह और मात, एक इंच मुस्कान (मन्नू भंडारी के साथ), कुलटा, अनदेखे अनजाने पुल, मंत्रविद्ध (उपन्यास) देवताओं की मूर्तियाँ, खेल-खिलौने, जहाँ लक्ष्मी कैद है, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, ढोल और अपने पार, वहाँ तक पहुँचने की दौड़, श्रेष्ठ कहानियाँ, प्रिय कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियाँ, प्रेम कहानियाँ, दस प्रतिनिधि कहानियाँ और चौखटे तोड़ते त्रिकोण। (अब तक की तमाम कहानियाँ पड़ाव-1, पड़ाव-2 और 'यहाँ तक' शीर्षक तीन जिल्दों में संकलित) (कहानी संग्रह), आवाज़ तेरी है (कविता संग्रह) कहानी : स्वरूप और संवेदना, उपन्यास : स्वरूप और संवेदना, कहानी : अनुभव और अभिव्यक्ति, औरों के बहाने, अठारह उपन्यास, कांटे की बात शृंखला (निबन्ध संग्रह)। 'सम्पादन : नये साहित्यकार पुस्तकमाला में मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, फणीश्वरनाथ रेणु तथा मन्नू भंडारी की चुनी हुई कहानियाँ। एक दुनिया : समानान्तर, कथा-यात्रा, कथा-दशक, आत्मतर्पण और काली सुखियाँ (अफ्रीकी कहानियाँ)। 'अनुवाद : हमारे युग का एक नायक : लर्मेल्तोव, प्रथम प्रेम, 'वसंत प्लावन : तुर्गनेव, टक्कर : ऐन्तोन चेखव, संत 'सर्गीयस : टालस्टॉय, एक महुआ : एक मोती : स्टाइन बैक, 'अजनबी : अलबेयर कामू (छहों उपन्यास कथा-शिखर-1,2 शीर्षक से दो जिल्दों में संकलित)। निधन : 28 अक्टूबर 2013

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