भक्तिकाव्य का समाजदर्शन

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ISBN:978-93-5000-988-8

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भक्तिकाव्य ने लंबी यात्रा तय की और उसमंे कबीर, जायसी, सूर, तुलसी, मीरा जैसे सार्थक कवि हैं। मध्यकाल ने इस काव्य की कुछ सीमाएँ निश्चित कर दीं, पर भक्त कवियों ने अपने समय के यथार्थ से मुठभेड़ का प्रयत्न किया। वे परिवेश से असुतुष्ट-विक्षुब्ध कवि हैं और समय से टकराते हुए, वैकल्पिक मूल्यसंसार का संकेत भी करते हैं। इस प्रकार भक्तिकाव्य में समय की स्थितियाँ समाजशास्त्र के रूप में उपस्थित हैं, जिसे तुलसी ने ‘कलिकाल’ कहा‘-मध्यकालीन यथार्थ। कबीर अपने आक्रोश को व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त करते हैं पर उच्च्तर मूल्यसंसार का स्वप्न भी देख्ते हैं। भक्तिकाव्य वैकल्पिक मूल्य-संसार की खोज करता हुआ, उच्चतम धरातल पर पहुंचता है- रामराज्य, वैकुंठ, अनहद नाद, प्रेम-लोक, वृंदावन आदि के माध्यम से और इस दृष्टि से कवियों का समाजदर्शन उल्लेखीन है। यथार्थ रचना में ही यह क्षमता होती है कि वह अपने समय से संवेदन-स्तर पर टकराती हुई, उसे अतिक्रमित भी करती है, और मानवीय धरातल पर ‘काव्य-सत्य’ की प्रतिष्ठा की आकांक्षा भी उसमें होती है। भक्तिकाव्य ने इसे संभव किया और इसलिए वह चुनौती बनकर उपस्थित है तथा नयी पहचान का निमंत्रण देता है।

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