हमारे लोकप्रिय गीतकार: बालस्वरूप राही

Format:Hard Bound

ISBN:81-7055-958-6

लेखक:शेरजंग गर्ग

Pages:148

मूल्य:रु95/-

Stock:In Stock

Rs.95/-

Details

हिन्दी कविता में बालस्वरूप राही का नाम अपनी भाषायी सादगी, संवेदनात्मक संपन्नता एवं व्यक्ति से लेकर समष्टि तक व्याप्त सुकोमल आवेगों और तीखें तेवरों के कारण एक विशिष्ट स्थान का अधिकारी है। दिनकर, बच्चन, नेपाली, रंग की पीढ़ी के बाद के उल्लेखनीय हस्ताक्षर बालस्वरूप राही आधुनिक गीत के भी एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। साहित्यिक पत्रकारिता और संपादन के क्षेत्र में अपनी ख़ास पहचान बनाने वाले राही ने कविता को जनोन्मुख बनाने की दिशा में अपना सम्पूर्ण योगदान किया। उन्होंने कविता को मात्र कुछ बौद्धिकों के मानसिक व्यायाम का साधन नहीं समझा। यही कारण है कि राही के प्रशंसकों में समाज के प्रत्येक वर्ग के सुधीजन आसानी से मिल जाते हैं। गीतों को आधुनिक रंग देने, उसे महानगरीय ऊहापोह से जोड़ने का काम करने वाले बालस्वरूप राही ने उर्दू लोकप्रिय प्रचलित शैलियों रुबाई, किता एवं ग़ज़ल में भी अपना कमाल दिखाया है और बेजोड़ लिखा है। उनका मुक्तछंद भावना मुक्त न होकर वर्जना मुक्त है। इसलिए सीधे प्रभावित करता है।

Additional Information

No Additional Information Available

About the writer

SHERJUNG GARG

SHERJUNG GARG डॉ गर्ग का जन्म 29 मई, 1937 को देहरादून में हुआ। हिन्दी में व्यंग्य-ग़ज़लें और इनका शोध-प्रबंध 'स्वातंत्र्‌योत्तर हिन्दी-कविता में व्यंग्य' चर्चित रहे। 'बाज़ार से गुज़रा हूं', 'दौरा अंतर्यामी का', 'क्या हो गया कबीरों को' और 'रिश्वत-विषवत' डॉ गर्ग की प्रमुख व्यंग्य-कृतियां हैं।

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality