हंस के विमर्श-2

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-919-2

लेखक:राजेन्द्र यादव

Pages:

मूल्य:रु1500/-

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Details

‘हंस’ साहित्यिक पत्राकारिता की गौरवशील परम्परा में खुद को स्थापित कर पाया है तो इसका बड़ा कारण ऐतिहासिक परिवर्तनों के इस नित सर्जित-विसर्जित दौर में महत्त्वपूर्ण और रोचक की पहचान कर पाने की इसकी क्षमता रही। इस दौर के साहित्य की कई लोगों ने अस्मितामूलक साहित्य के रूप में पहचान की है और इस साहित्य को हाशिये से केन्द्र में ला खड़ा करने में सर्वाधिक सहयोगी भूमिका ‘हंस’ की मानी जानी चाहिए। खास कर दलित-विमर्श और स्त्राी-विमर्श को हिन्दी की मुख्य धारा की बहसों का केन्द्र बना देने में पत्रिका के रूप में सबसे बड़ा योगदान ‘हंस’ का माना जाएगा। ‘हंस’ ने बहसों-विवादों में पक्ष लेने से कभी गुरेज नहीं किया। ‘हंस’ ने साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक सीमाओं को हमेशा छद्म माना और अपने पाठक वर्ग की निर्भ्रान्त पहचान की। हिन्दी क्षेत्रा के छोटे शहर-कस्बों, गाँवों के लोग इसके केन्द्र में रहे। ‘हंस’ ने अपने पाठक वर्ग के लिए प्रवचनकर्ता की भूमिका निभाने से परहेज करते हुए उनसे सार्थक और जुझारू बहस में भिड़ने का जिम्मा सँभाला। ‘हंस’ की बहसों की सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें बहस को एक अंक में समेटने की कोई जल्दी नहीं दिखती। एक बहस चार-पाँच महीनों तक जारी रहती है। लम्बी बहस विभिन्न अंकों में बँट जाने से लम्बी नहीं लगती, और अधिकांश पक्ष तात्कालिक प्रतिक्रियावाले होने से बच जाते हैं। एक और फायदा यह होता है कि पाठकों को अगले अंकों का इन्तजार रहता है। पर कुछ बहसों में यह भी देखा जा सकता है कि लम्बे समय तक चलनेवाली बहस अपने मूल मुद्दे को छोड़कर कहीं और चली गयी है। जो भी हो, लम्बी बहसों के कारण ही कई मुद्दे केन्द्र में आ सके और कई सवालों पर हिन्दी-समाज का माइंड-सेट बदलने में सफल हो पाए हैं।

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