हिन्दी कहानी : वक़्त की शिनाख्त और सृजन का राग

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-926-7

लेखक:रोहिणी अग्रवाल

Pages:192

मूल्य:रु395/-

Stock:In Stock

Rs.395/-

Details

प्रतिष्ठित कथालोचक रोहिणी अग्रवाल आलोचना में सृजनात्मकता का नया आयाम जोड़ देने के कारण अपनी पाँत अलग बनाती हैं। कहानी, उनके लिए विश्लेषण की वस्तु नहीं, संवाद की ज़मीन है जहाँ बुनी गयी घटनाओं, पात्रों, चरित्रों और परिवेश के साथ एकमेक हो वे गहरी तल्लीनता से उनमें डूब भी जाती हैं और फिर एक निरासक्त आत्मपरकता से अपने वक़्त की शिनाख़्त भी कर जाती हैं। जाहिर है तब उनकी कथालोचना कथाकृति का आलोचनात्मक मूल्यांकन भर नहीं रहती, कथाकृति के समानान्तर रचा गया एक पूरक पाठ बन जाती है जहाँ वे आलोचक की हैसियत से भी उपस्थित हैं और एक कथा-पात्र की तरह कथा-समय और वर्तमान सत्य में हस्तक्षेप करती सर्जक कलाकार भी। पुस्तक ‘हिन्दी कहानी: वक़्त की शिनाख़्त और सृजन का राग’ चौदह लेखों का संग्रह है जिसमें पिछले पचास वर्ष की हिन्दी कहानी के जरिए समय और समाज में होने वाली हलचलों के साथ-साथ लेखकीय सरोकारों और कथा-शिल्प में आने वाले बदलावों को भी परखा गया है। भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण ने अपने सम्मोहन-पाश में जकड़ कर व्यक्ति और व्यवस्था दोनों को जिस प्रकार असंवेदनशील और आत्मकेन्द्रित किया है, वह समय का तेजी से विघटन भी कर रहा है, और विघटन के भीतर छुपी सृजन की नयी सम्भावनाओं को हौले-हौले उकेर भी रहा है। रोहिणी अग्रवाल की खासियत है कि वे माइक्रो और मैक्रो दोनों स्तरों पर कहानी की अन्तस्संरचना में निहित तत्त्वों को पूरी तार्किकता एवं रागात्मकता से पकड़ती और जोड़ती हैं। वे मानती हैं कि प्रायः हर कथाकार अपने समय का अतिक्रमण कर चुप्पियों के बीच छुपी मुखरताओं को गुनते हुए वक़्त की पड़ताल का गुरु दायित्व निभाता है। मुक्तिबोध, ज्ञानरंजन और संजीव सरीखे कथाकार अपने समानधर्मी सरोकार - आत्मालोचन और यथार्थ को पुनर्सर्जित करते रोमानी आदर्शवाद के कारण जहाँ एक अलग कथा-दृष्टि के पैरोकार बनते हैं, वहीं हारनोट, अल्पना मिश्र, सत्यनारायण पटेल और कैलाश वानखेड़े जैसे अगली पीढ़ी के कहानीकार मनुष्य की निजता को सामूहिक चेतना में ढाल कर अस्मिता की रक्षा को मनुष्य के संगठित क्षेत्रा का दर्जा देते हैं। आलोचना को किसी एक सुनिश्चित साँचे में बाँध कर स्वयं को जकड़ने और आवृत्तिमूलक बना लेने की प्रवृत्ति का विरोध कर रोहिणी अग्रवाल अपने हर लेख में शिल्प का एक नया साँचा गढ़ती हैं। कहीं एक पूरी पीढ़ी के कथा-सरोकारों की जाँच में अतीत और वर्तमान के बीच निरन्तर आवाजाही है, कहीं एक कहानी के भीतर पैठ कर हर रग-रेशे की बेचैन पड़ताल में लेखक और युग के अन्तस् को थहाने की कोशिश है, तो कहीं उसके समूचे कृतित्व के जरिए उसकी विकास-यात्रा के उतार-चढ़ाव-मोड़ों को जानने का कौतूहल भी। जाहिर है इस पूरी प्रक्रिया में साहित्यालोचना धीर-गम्भीर समाजशास्त्रीय विमर्श भी बन जाता है और हर घेरे को तोड़ कर उन्मुक्त आकाश में विचरण करने की आकांक्षा भी। ‘हिन्दी कहानी: वक्श्त की शिनाख़्त और सृजन का राग’ एक ऐसी कृति है जिसे पढ़ते हुए पाठक बार-बार इस विश्वास को गुनता है कि आलोचना सृजनात्मक साहित्य के पाठ की दोयम विधा नहीं, युगीन विमर्शों-सवालों-मुद्दों पर किया गया सुचिन्तित रचनात्मक संलाप है।

Additional Information

हिन्दी कहानी : वक़्त की शिनाख्त और सृजन का राग

About the writer

ROHINI AGGARWAL

ROHINI AGGARWAL रोहिणी अग्रवाल - जन्म: 9 दिसम्बर 1959 शैक्षणिक योग्यता: एम. ए. हिन्दी एवं अंग्रेजी, पीएच.डी. हिन्दी; बैचलर इन जर्नलिज़्म एंड मास कम्युनिकेशन प्रकाशित कृतियाँ: हिन्दी उपन्यास में कामकाजी महिला, एक नज़र कृष्णा सोबती पर, इतिवृत्त की संरचना और संरूप (पन्द्रह वर्ष के प्रतिमानक उपन्यास), समकालीन कथा साहित्य: सरहदें और सरोकार (आलोचना); स्वप्न और संकल्प, साहित्य की ज़मीन और स्त्री-मन के उच्छ्वास, साहित्य का स्त्री-स्वर (स्त्री लेखन); घने बरगद तले, आओ माँ, हम परी हो जाएँ, कहानी यात्रा: सात (सम्पादित); मुक्तिबोध की प्रतिनिधि कहानियाँ (सम्पादित) (कहानी संग्रह)। पुरस्कार/सम्मान: हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा कहानी पुरस्कार, 1987 एवं 2003, हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा ‘समकालीन कथा साहित्य: सरहदें और सरोकार’ पुस्तक पर आलोचना पुरस्कार, 2008; स्पन्दन आलोचना पुरस्कार, 2010। सम्प्रति: डीन, मानविकी संकाय एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक।

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality