आता ही होगा कोई नया मोड़

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5229-070-3

लेखक:दामोदर खड़से

Pages:288

मूल्य:रु450/-

Stock:In Stock

Rs.450/-

Details

लीलाधर जगूड़ी मेरे बहुत प्रिय कवियों में रहे हैं। लेकिन उनके बारे में कुछ कहने का ये पहला मौक़ा है। जगूड़ी मुझसे काफी छोटे हैं। पचहत्तर के वो हो गये, मैं करीब नब्बे साल का हो गया हूँ। इस तरह वह मेरे छोटे भाई की तरह भी हैं। उनके टिहरी और उत्तरकाशी तब जाना हुआ था जब टिहरी रियासत हुआ करती थी। चन्द्रकुँवर वरत्वाल वहाँ के बड़े कवि थे। तब पहाड़ के लोग, पढ़े-लिखे लोग सीधे दिल्ली के बजाय इलाहाबाद आते थे। कुमाऊँ के हिस्से के लोग तो लखनऊ जाया करते थे क्योंकि वहाँ के लोग अपने नेताओं को ज्यादा मिलते थे। गढ़वाल के लोग इलाहाबाद और वाराणसी में आते-जाते थे। चन्द्रकुँवर वरत्वाल तो काशी के ही होकर रह गये थे। उनसे मिलने-जुलने और उनसे कविताएँ सुनने के अवसर समय-समय पर आते रहे हैं। हाल में मुझे उनकी तमाम प्रकाशित पुस्तकों से कई कविताओं को देखने का फिर मौक़ा मिला।... ...जगूड़ी की कविता में आप पहाड़ या हिमालय ढूँढ़ेंगे तो नहीं मिलेगा क्योंकि वो प्रकृति के कवि नहीं मनुष्य के कवि हैं। उनमें उत्तराखंड नहीं, उनके पहाड़ नहीं, जैसे कि कई कवि वहाँ के चित्रण से नहीं उभर सके, ऐसी बात जगूड़ी के कविता संसार में नहीं है। वो विशुद्ध मनुष्य कवि हैं। जगूड़ी के कविता के केन्द्र में जो संसार बनता है, उसमें वह सबसे अलग कवि हो जाते हैं। वह अवाम के कवि कहलाए जा सकते हैं। जगूड़ी की लोकप्रियता का एक कारण उनके कविताओं के इस गुण का होना भी है। और जैसा मैंने जिक्र किया, जगूड़ी संस्कृत के प्रचंड विद्वान हैं लेकिन उन्होंने आम लोगों की भाषा में कविताएँ लिखी हैं। एक संस्कृत पढ़ा-लिखा आदमी और उसकी भाषा में उसकी परछाईं दूर-दूर तक नहीं है। वह बोलचाल और आमफ़हम की भाषा में लिखते हैं। उनमें दूर-दूर तक भाषा के स्तर पर संस्कृतनिष्ठता नहीं है। इससे समझ आता है वो क्षेत्रीयता के दायरों से उठे हैं और भाषाई स्तर पर इस दौर के सबसे अलग कवि भी हैं। ये अलग बात है कि क्षेत्रीययता की पहचान लेखकीय स्तर पर काफी अहमियत रखती है। जगूड़ी की हिन्दी साहित्य में उतनी चर्चा नहीं हो सकी है जितनी होनी चाहिए थी। इस पर मैं ज्यादा बड़ी शिकायत नहीं करता लेकिन चर्चा होनी चाहिए। गढ़वाल और कुमाऊँ विश्वविद्यालय तो जाने क्या कर रहे हैं। वहाँ बड़े कवियों पर शोध का कोई काम नहीं हो रहा है। यह काम होना चाहिए। जगूड़ी पर कम चर्चा की बात को साहित्य और सरकारों के लोग समझें इस दिशा में मेरा आग्रह चाहे उतना बड़ा नहीं लेकिन एक इशारा भर तो मैं कर ही सकता हूँ।

Additional Information

सम्पादक प्रमोद कौंसवाल प्रकाशित पुस्तकें: अपनी ही तरह का आदमी, रूपिन सूपिन (दोनों कविता संग्रह), विष्णु खरे और बारबरा लोत्ज़े सम्पादित ‘जीवन्त साहित्य’ में अंग्रेज़ी, जर्मनी और हिन्दी में कविताएँ प्रकाशित। इसके अलावा वर्तमान साहित्य और पहल पत्रिकाओं के विशेष कविता संकलनों में रचनाएँ शामिल। विदेशी भाषाओं के बड़े कहानीकारों के अनुवाद की पुस्तक के अलावा इतिहास, संस्कृति और साहित्य सम्बन्धी पाँच अन्य पुस्तकें प्रकाशित। आजीविका के लिए पत्रकारिता। दिल्ली में प्रवास।

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