कवियों के बहाने वर्तमान पर बहस

Format:Hard Bound

ISBN:9789352292691

लेखक:

Pages:143

मूल्य:रु300/-

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इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता वस्तु एवं संवेदना की दृष्टि से नब्बे दशक की कविता का विकास है। यह पुस्तक समकालीन दौर की सामाजिक यथार्थ प्रवण,जनवादी,प्रतिरोधी कविता को काव्य चर्चा के केंद्र में लाने का प्रयास हाकी। इसमे कवि विमर्श द्वारा जीवन और कविता का वर्तमान परिदृश्य प्रस्तुत किया गया है। वातर्मान बहुआयामी यथार्थ के परिवेश में विकस्वर नयी काव्य संवेदना,सामाजिक सरोकार,प्रतिबद्धता और प्रतिरोधी चेतना के मूल में कवि का जीवन राग ही प्रकट हुआ है।

About the writer

DR.K.G PRABHAKARAN

DR.K.G PRABHAKARAN डॉ. के.जी. प्रभाकरन जन्म: 1944, कीच्चेरी, जिला एरणाकुलम, केरल शिक्षा: एम.ए. केरल विश्वविद्यालय, पीएच. डी., आगरा विश्वविद्यालय वृत्ति: केरल के विभिन्न राजकीय महाविद्यालयों में अध्यापन। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त। साहित्य सेवा: ‘साहित्य मण्डल पत्रिका’ का सम्पादन; ‘जन विकल्प’ पत्रिका का परामर्शदाता; ‘वाणी का मृत्युंजय’ (सम्पादन सहयोग); शोध पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित। सम्मान: भारतेन्दु भूषण सम्मान (उत्तर प्रदेश हिन्दी-उर्दू साहित्य अवार्ड कमेटी, लखनऊ); सम्मान (राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन, केरल)। सम्पर्क: ‘सुरभि’, ‘कोडुंङल्लूर-680664, केरल मोबाइल: 09249350404

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