भीड़ में खोया हुआ समाज

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-500-2

लेखक:मनोहर श्याम जोशी

Pages:170

मूल्य:रु450/-

Stock:In Stock

Rs.450/-

Details

भीड़ में खोया हुआ समाज

Additional Information

मनोहर श्याम जोशी लिखित सम्पादकीय आलेखों (जनवरी 1969 से मार्च 1971) का यह दूसरा खण्ड है। बरास्ता सहायक सम्पादक 'साप्ताहिक दिनमान' वह सम्पादक 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' की कुर्सी तक पहुँचे थे और जिस तरह पहँचे, सक्रिय पत्रकारिता वाले उनके जीवन के उस दौर को जानने-समझने, आकलन, विश्लेषण के सन्दर्भ में संक्षिप्ततः वह सारा कुछ इकट्ठे शायद आश्चर्यों भरा, दिलचस्प एवं जरूरी नजर आये। तो प्रसंग का प्रारम्भ सन् 1964 की अन्तिम तिमाही से करते हैं। सन् 1964 की अन्तिम तिमाही के शुरुआती महीने-अक्टूबर-का पहला-दूसरा सप्ताह रहा होगा। हिन्दी समाचार 'साप्ताहिक दिनमान' के प्रकाशन की योजना अपने अन्तिम चरण में चल रही थी। पत्रिका के प्रस्तावित सम्पादक अज्ञेय के सहयोगी के रूप में रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एवं श्रीकांत वर्मा के नाम तय हो चुके थे। मगर चूँकि ये तीनों के तीनों मूलतः कवि थे। लिहाजा अज्ञेय को एक ऐसे समर्थ गद्यकार की तलाश थी जो बहुपठित-बहुविषयविद् तो हो ही, उन द्वारा सुझाये देशी-विदेशी किसी भी विषय पर आनन-फानन वस्तुपरक आलेख एवं टिप्पणियाँ तैयार कर पाने की क्षमता रखता हो। तो प्रसंग यह रहा कि उन्हीं दिनों टाइम्स ऑफ़ इण्डिया प्रकाशन से कुछ लोग नेफा के दौरे पर गये थे और काफ़ी तस्वीरों के साथ प्रकाशन योग्य सामग्री बटोर लाये थे। डॉ. भारती चाहते थे कि अंग्रेज़ी साप्ताहिक 'इलस्ट्रेटेड वीकली' से पहले धर्मयुग का अंक बाजार में आ जाए। मगर सवाल था कि रातोंरात बैठकर इतनी सारी सामग्री तैयार कौन करेगा? डॉ. भारती की तरफ़ से ऑफर जोशी जी तक पहुँचा, जो तब भारतीय सूचना सेवा के दर्ज़ा वन पदाधिकारी थे। अपने ऑफिस से उन्होंने दो दिनों की छुट्टी ली और कवर-स्टोरी के अलावा एक और रचना को छोड़ बाकी पूरे-के-पूरे अंक की सामग्री लिख-लिखाकर छुट्टी। (भूमिका से)

About the writer

MANOHAR SHYAM JOSHI

MANOHAR SHYAM JOSHI मनोहर श्याम जोशी 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्रा जीवन से ही लेखक और पत्राकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आषीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्श से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये। प्रेस, रेडियो, टी.वी., वष्त्तचित्रा, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेशण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विशय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया है। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्श के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्श के होने आये। केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतन्त्रा लेखन करते रहे । निधन: 30 मार्च 2006।

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality