विस्मृति के बाद

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-756-0

लेखक:गणेश देवी अनुवाद अवधेश त्रिपाठी

Pages:144

मूल्य:रु295/-

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Rs.295/-

Details

विस्मृति के बाद (केन्द्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार,1994)

Additional Information

औपनिवेशिक अनुभव उपनिवेशित समाजों में अनेक टकरावपूर्ण प्रवृत्तियों को जन्म देता है। एक बहत आम प्रवृत्ति होती है कि उपनिवेशकों की नकल की जाये और उनका अनुमोदन हासिल किया जाये। लेकिन यह राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारनेवाला भी हो सकता है, जो औपनिवेशिक प्रभावों का विरोध करने की प्रवृत्ति को जन्म दे सकता है। साथ ही यह पुनरुत्थानवादी रूमानियत और कठोर यथातथ्यवादी राजनीति को भी जन्म दे सकता है। इन परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों के एक साथ जन्म के चलते विचित्र किस्म के सांस्कृतिक गतिविज्ञान का जन्म होता है। उपनिवेशित संस्कृति एक ही साथ हिंसात्मक ढंग से प्रगतिशील और आक्रामक रूप से प्रतिगामी हो जाती है, और इसके परिणामस्वरूप उसमें गतिहीन बने रहने की सम्भावना होती है। इस सांस्कृतिक गतिहीनता को समझने में एक उपयुक्त इतिहासशास्त्र की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। मनमाने तरीके से होनेवाली इतिहास की पुनरुत्थानवादी पुनर्रचना वास्तविक सांस्कृतिक बदलावों और उन्हें समझने की बौद्धिक पद्धतियों के बीच की दूरी बढ़ा देती है। इसी तरह से आधुनिकता की प्रक्रियाओं को समेकित रूप से प्रगति मान लेने की विचारधारात्मक और मनमानी अवधारणा साहित्यालोचना जैसी बौद्धिक व्यवस्थाओं की सन्तोषजनक व्याख्या नहीं कर पाती, क्योंकि ये परम्परा और प्रगति के विचारधारात्मक खाँचों में फिट नहीं बैठती।

About the writer

GANESH DEVY TRANSLATED BY AWADHESH TRIPATHI

GANESH DEVY TRANSLATED BY AWADHESH TRIPATHI गणेश देवी प्रख्यात साहित्यालोचक, भाषाविद् और सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं। भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर, बड़ोदा और आदिवासी एकेडमी तेजगढ़ के संस्थापक हैं। साहित्य अकादेमी पुरस्कार, सार्क राइटर्स फाउंडेशन अवार्ड, प्रिंस क्लास अवार्ड, यूनेस्को के लिगुआपैक्स अवार्ड और पद्मश्री से सम्मानित । फिलहाल पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के चेयरमैन हैं। यह आजादी के बाद का पहला भाषा सर्वेक्षण है, जो 780 जीवित भाषाओं के बारे में है और 50 खंडों गणेश देवी में प्रकाशित हुआ है। अवधेश त्रिपाठी जन्म : प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश में, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पढ़ाई-लिखाई की। आइसा छात्र आन्दोलन में सक्रियता रही। कुछ समय तक पत्रकारिता करने के बाद फिलहाल असम विश्वविद्यालय के दिफू कैंपस में अध्यापन। गोरख पाण्डेय की काव्य-दृष्टि पर आलोचना पुस्तक प्रकाशित । अनुवाद, साहित्य व सिद्धान्त में रुचि। जन संस्कृति मंच से सम्बद्ध।

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