भारतीय नीतियों का सामाजिक पक्ष

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ISBN:978-93-5229-622-4

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Pages:496

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भारतीय नीतियों का सामाजिक पक्ष

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हाल के वर्षों में भारत में सामाजिक नीतियों की पहुँच में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आज विद्यालयों और आँगनबाड़ी (बाल देखभाल केन्द्र) जैसी सुविधाएँ हर गाँव में स्वीकार्य आदर्श बन चुकी हैं; स्वास्थ्य सेवाएँ अधिक सुलभ और अधिक व्यवस्थित हैं; पोषाहार योजनाएँ, लोक कल्याण कार्य और सामाजिक सुरक्षा पेंशन पहले की तुलना में अब ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँच रहे हैं। इनमें से कुछ सुविधाएँ अब प्रवर्तनीय वैधानिक अधिकारों का रूप लेती जा रही हैं। किन्तु अभी तक भी इन सामाजिक कार्यक्रमों का क्रियान्वयन आदर्श स्थिति से बहुत दूर है। अधिकांश भारतीय राज्यों को अभी भी उपयुक्त जगहों पर ऐसी प्रभावी सामाजिक नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए एक लम्बा रास्ता तय करना है जो सीधे-सीधे आम और वंचित तबके के हितों, माँगों और अधिकारों से मुखातिब हों। भारतीय नीतियों का सामाजिक पक्ष उक्त विषय और उससे जुड़े मुद्दों पर लिखे गये उन आलेखों का संग्रह है, जो पहले इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित हो चुके हैं। पुस्तक के 18 अध्याय मुख्यतः इन छह बिन्दुओं के आसपास केन्द्रित हैं : 'स्वास्थ्य, शिक्षा,' 'खाद्य सुरक्षा,' 'रोजगार गारंटी,' 'पेंशन और नगद हस्तान्तरण' तथा 'विषमता और सामाजिक बहिष्कार'। प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा किये गये इन आलोचनात्मक मुद्दों के व्यापक विश्लेषण को पहली बार किसी एक पुस्तक में समाहित किया गया है। इन अध्ययनों में आँकड़ों की बहुलता है जो इस क्षेत्र में शोध करने वालों के लिए काफी उपयोगी साबित होगी। ज्याँ द्रेज की 'प्रस्तावना' से युक्त भारतीय नीतियों का सामाजिक पक्ष समाजविज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान और विकास अध्ययन के छात्रों और शोधार्थियों के लिए एक अनिवार्य पुस्तक है।

About the writer

Editor Jean Dreze, Co-Editor Kamal Nayan Chaubey

Editor Jean Dreze, Co-Editor Kamal Nayan Chaubey ज्याँ द्रेज ने यूनिवर्सिटी ऑफ एसेक्स से गणितीय अर्थशास्त्र का अध्ययन किया है और इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूट, नयी दिल्ली से पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और डेल्ही स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्यापन किया है और वर्तमान में राँची विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफ़ेसर और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में मानद प्रोफ़ेसर हैं। विकास अर्थशास्त्र और सार्वजनिक नीतियों, विशेषकर उनके भारतीय सन्दर्भों में उन्होंने बहुमुखी योगदान दिया है। ग्रामीण विकास, सामाजिक असमानता, प्राथमिक शिक्षा, शिशु पोषण, स्वास्थ्य सेवाएँ और खाद्य सुरक्षा उनके शोध के प्रमुख विषय हैं। ज्याँ द्रेज ने अमर्त्य सेन के साथ हंगर एंड पब्लिक एक्शन (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1989) और एन अनसर्टेन ग्लोरी: इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शंस (ओयूपी, 2002) का सह-सम्पादन किया है और पब्लिक रिपोर्ट ऑन बेसिक एजुकेशन इन इंडिया के लेखक-मंडल से भी जुड़े हैं जो प्रोब (PROBE) रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है। कमल नयन चौबे दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में जातियों का राजनीतिकरण: बिहार में पिछड़ी जातियों के उभार की दास्तान (2008), और जंगल की हकदारी: राजनीति और संघर्ष (2015) सम्मिलित हैं। इन्होंने जॉन रॉल्स और विल किमलिका जैसे सुप्रसिद्ध राजनीतिक सिद्धान्तकारों की कृतियों का हिन्दी अनुवाद किया है। ये विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) से प्रकाशित होने वाली समाज विज्ञान की पूर्व-समीक्षित पत्रिका प्रतिमान: समय समाज संस्कृति की सम्पादकीय टीम से भी जुड़े हैं।

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