र्द्धवृत्त : शैलप्रिया सृजन समग्र

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-81709-82-8

लेखक:

Pages:472

मूल्य:रु695/-

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'प्रत्येक रचना की यह नियति होती है कि वह अपने रचनाकार से विदा ले लेती है और अपने पाठक तक पहुँच जाती है। रचनाकार हमारे बीच नहीं रहता, किन्तु रचनाएँ बनी रहती हैं और यही रचनाकार का पुनर्जन्म है।' –सत्यनारायण/ ...पढ़ी थीं मैंने शैलप्रिया की कविताएँ जिनमें कटे-सूखे काठ में भी नये पत्ते पैदा कर देने की ताकत साँस ले रही थी। -राजेन्द्र प्रसाद सिंह / ...शैलप्रिया के अधुरे जीवन का यह परा काम किसी भी पाठक को उनके असमय निधन से विषन्न कर सकता है, क्योंकि उनका कवि-व्यक्तित्व संवेदनाओं और विचारों के एक घेरे में बँध कर रह जाने वाला नहीं, बल्कि उस घेरे को बार-बार तोड़ने और आत्मविस्तार के लिए संघर्षरत रहने वाला व्यक्तित्व था। शैलप्रिया की कविता का जो सर्वोत्तम है, वह अपने इस और ऐसे अनेक गुणों के कारण बाद में भी पढ़ा और याद किया जाता रहेगा और हिन्दी के महिला लेखन की कोई भी चर्चा उनकी चर्चा के बिना अधूरी मानी जायेगी।' -दिनेश्वर प्रसाद /'यह सच में आश्चर्य की बात है कि नारीवादी लेखकों की प्रायः सभी भावनाओं और संवेदनाओं को प्रस्तुत करते हुए भी शैलप्रिया उन धारणाओं से अपने को बचा लेती हैं। जिनके कारण उग्रता या आक्रामकता आ जाती है। स्थितियाँ कविताओं में इतनी बेधक हैं कि यह असम्भव है कि उनके सम्बन्ध में आक्रोश न हो। लक्ष्य करना यह है कि उद्वेग और उत्तेजना को वश में रखते हुए इस तरह लिखा गया है कि कविता में पर्याप्त संयम दिखलायी पड़ता है। संयम नहीं होता तो कविताएँ बड़बोलेपन से भरी हुई होती और तब शैलप्रिया और मोना गुलाटी और मणिका मोहिनी में शायद फ़र्क नहीं रहता। -नागेश्वर लाल

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