बात बात में बात

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-8143-584-2

लेखक:डॉ.नामवर सिंह

Pages:352

मूल्य:रु495/-

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Rs.495/-

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बात बात में बात

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मैं अपने तईं मानता हूँ कि आलोचक को दो भूमिकाएँ निभानी चाहिए। आलोचक वही काम करता है जो फौज में जिसे 'सैपर्स एण्ड माइनर्स' कहते हैं, इंजीनियर करता है। फौज के मार्च करने से पहले झाड़-जंगल साफ़ करके नदी-नाले पर जरूरी पुल बनाते हुए फौज को आगे बढ़ने के लिए रास्ता तैयार करने का जोखिम उठाए, सड़क बनाए। साहित्य में इस रूपक के माध्यम से मैं कहूँ कि जहाँ विचारों, विचारधाराओं, राजनीतिक, सामाजिक प्रश्नों आदि के बारे में उलझनें हैं, वह अपने विचारों के माध्यम से थोड़ा सुलझाए, कोई बना-बनाया विचार न दे ताकि रचनाकारों को स्वयं अपने लिए सुविधा हो। ये मैं आलोचक के लिए 'सैपर्स एण्ड माइनर्स' की भूमिका मानता हूँ क्योंकि आगे-आगे वही चलता है और पहले वही मारा जाता है। दुश्मन आ रहा है तो जोख़िम उठाने के लिए सबसे पहले मोर्चे पर वही बढ़ता है और ज़ख्मी होने का ख़तरा भी वही उठाता है। यह काम आलोचक करता है और उसे करना भी चाहिए। क्योंकि हम रचनाकारों के लिए रास्ता बनाने की कोशिश करते हैं। यह एक काम हुआ। दूसरा, रास्ता बनाने के साथ ही वह उनके साथ-साथ चलता भी है। वह रचनाकार का सहचर है। इसलिए आलोचक को 'सह्रदय ' कहते हैं। समान हृदय वाला आलोचक को किसी की आलोचना करने से पहले उसी 'भावभूमि' पर होना चाहिए जिस भावभूमि पर पहुँचकर रचनाकार रचना कर रहा है। गुण-दोष बाद में देखना चाहिए। लेकिन जिस लहर मान पर वह है, आप मन से वहीं पहँचें। और वहीं पहुँचकर देखें कि सचमुच वो कहाँ है? कहाँ से बोल रहा है? निराला जी के शब्दों में वह किस कोठे से बोल रहा है? इसलिए आलोचक-कर्म जो है मूलतः सहृदय का है। आलोचक न्यायाधीश नहीं है। है तो वह वकील और ऐसा वकील जो सफाई पक्ष का है, 'डिफेंस' का है मुख्य रूप से, और 'डिफेंस' का ऐसा ईमानदार वकील, जो अपना केस लेकर आने वालों को सब बता देता है कि तुम्हारा केस कमज़ोर है; कहाँ हो? कैसे हो? बावजूद इसके वे उसे बचाने की कोशिश करते हैं। - नामवर सिंह

About the writer

DR. NAMVAR SINGH

DR. NAMVAR SINGH डॉ. नामवर सिंह डॉ. नामवर सिंह का जन्म 1 मई, 1927 को वाराणसी जिले के जीमनपुर नामक गाँव में हुआ। सम्पूर्ण शिक्षा वाराणसी में। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. (1951) और पीएच.डी. (1956); फिर उसी विश्वविद्यालय में 1956 ई. तक अध्यापन। चार वर्षों तक जोधपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफ़ेसर तथा अध्यक्ष। अल्पकाल के लिए क.मा.मु. हिन्दी विद्यापीठ, आगरा के निदेशक। 1974 से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली में भारतीय भाषा केन्द्र के संस्थापक अध्यक्ष तथा हिन्दी प्रोफ़ेसर रहे। साहित्यिक जीवन का आरम्भ कविता से हुआ और पत्र-पत्रिकाओं में कुछ कविताएँ प्रकाशित भी हुईं, किन्तु पहली प्रकाशित पुस्तक 'बकलम खुद' (1951) है जो व्यक्तिव्यंजक निबन्धों का संग्रह है। हिन्दी शिक्षा जगत में सर्वप्रथम 'हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग' (1952) नामक पुस्तक से जाने गये जो मूलतः एम.ए. में लघु शोधप्रबन्ध के रूप में लिखी गयी थी। पीएच.डी. उपाधि के लिए स्वीकृत शोध प्रबन्ध है ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा' (1956)। शोध के अतिरिक्त मुख्य कार्यक्षेत्र है आधुनिक साहित्य की आलोचना। प्रमुख आलोचनात्मक ग्रन्थ हैं-आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (1954), छायावाद (1955), इतिहास और आलोचना (1957), कहानी नयी कहानी (1964), कविता के नये प्रतिमान (1968), दूसरी परम्परा की खोज (1982) और वाद-विवाद संवाद (1990)। 'कविता के नये प्रतिमान' साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत है। 'शिक्षण-कार्य के अतिरिक्त दो वर्षों तक साप्ताहिक 'जनयुग' का सम्पादन किया और 1967 से त्रैमासिक 'आलोचना' का सम्पादन।

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