लोकतंत्र की चुनौतियाँ

Format:Paper Back

ISBN:978-81-8143-329-9

लेखक:सच्चिदानन्द सिन्हा

Pages:168

मूल्य:रु100/-

Stock:In Stock

Rs.100/-

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लोकतंत्र की चुनौतियाँ

Additional Information

अब तक दलित और पिछड़ों के जातीय उभार का नकारात्मक पहल काफ़ी उजागर हुआ है। लेकिन लोगों की सेकलर'। आवश्यकताओं को जातीय गौरव' प्रदान कर बहुत दिनों तक नहीं टाला जा सकता। नेताओं के तामझाम की गरिमा में अपनी आर्थिक दैन्य को वे सदा के लिए नजरअंदाज नहीं कर सकते। जातीय पिछड़ेपन के भाव से मुक्त होने पर वे आर्थिक मुद्दों पर अधिक ध्यान देने लगेंगे भले ही जातीय नेता दुसरी जातियों से विवाद को जिलाने की कोशिश करते रहें। जैसे-जैसे दलित और अति पिछड़े राजनीति में महत्त्वपूर्ण होने लगेंगे वैसे-वैसे आर्थिक मुद्दों का महत्त्व साफ़ होगा क्योंकि ये जातियाँ लगभग बिना अपवाद, देश भर में भूमिहीन और संपत्तिहीन हैं जिनकी स्थिति सुधारने के लिए दो-चार लोगों को नौकरियों में आरक्षण देना बिल्कुल अपर्याप्त होगा और उनकी स्थिति अर्थव्यवस्था को समतामूलक बनाकर ही सुधारी जा सकती है। एक सीमा के बाद बिना आर्थिक समता के भेदभावहीन सामाजिक समरसता भी स्थापित नहीं की जा सकती। जैसे-जैसे आर्थिक और सामाजिक दूरियाँ कम होंगी जातियों से ऊपर उठ लोग शुद्ध रूप से मनुष्य के रूप में संवाद स्थापित कर सकेंगे और लोकतंत्र के बुनियादी भाईचारे की तरफ़ संक्रमण संभव होगा। इस दिशा में हाल के वर्षों में आया आर्थिक भूचाल महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। भूमंडलीकृत दुनिया में संपत्ति के केंद्रीकरण से उत्तरोत्तर बड़ी संख्या में लोग आर्थिक दृष्टि से समाज के हाशिए पर डाले जा रहे हैं। इसमें दलित और पिछड़ी जातियों के अलावा तथाकथित अगड़ी जातियों के लोग भी भारी संख्या में अपने परिवेश से विस्थापित हो नगरों के फुटपाथों और झुग्गियों में दरिद्रता के समान साँचे में ढाले जा रहे हैं।

About the writer

SACHCHIDANAND SINHA

SACHCHIDANAND SINHA विशिष्ट समाजवादी चिंतक। लगभग पैंतालीस वर्षों से भारतीय किसान आंदोलनों और मजदूर आंदोलनों में सक्रिय रहे। राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शन, कला, सौंदर्यशास्त्र के गंभीर अध्येता। प्रकाशित पुस्तकें : सोशलिज्म एंड पॉवर; कॉस्ट सिस्टम : मिथ, रिएलिटी, चैलेंज; इमरजेंसी इन ए पर्सपेक्टिव; एडवेंचर्स ऑफ लिबर्टी; द बिटर हार्वेस्ट; कोअलिएशन इन पॉलिटिक्स; द अनआर्ड प्राफेट; केआस एंड क्रिएशन; जिंदगी सभ्यता के हाशिए पर; समाजवाद के बढ़ते चरण; भारतीय राष्ट्रीयता और सांप्रदायिकता।

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