जिक्र-ए-फ़िराक़ मेरे नग्मों को नींद आती है

Format:Paper Back

ISBN:978-81-8143-718-1

लेखक:

Pages:92

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जिक्र-ए-फ़िराक़ मेरे नग्मों को नींद आती है

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डायरी 23 फरवरी, 1982 को ही पूरी हो चुकी थी, जो आपके हाथ में ‘मेरे नग्मों को नींद आती हैं’ की शक्ल में है। मैं डायरी नहीं लिखता था, न डायरी लेखन की कला से ही मेरा कोई परिचय था। दरअसल बात वह थी कि मेरे गाँव, शहर के लोग और मेरे साथी-संगी या मेरे स्कूल और कॉलेज़ के दिनों के लोग ही ऐसे नहीं थे जिनकी बातें डायरी में नोट कर लेने के क़ाबिल हों। हाँ, ऐसे लोग जरूर मिलते रहे जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और आचरण से मुझे प्रभावित किया कुछ हद तक। मगर न तो किसी का रात-दिन का साथ ही रहा और न तो वे लोग ग़ैर-मामूली तरह के मामूली लोग ही थे। कभी कोई इधर-उधर का साधारण इन्सान मिल जाता था और इस काबिल होता था कि उसकी बातें मेरी चेतना की डायरी में दर्ज़ हो जायें, तो उसकी बातें अपने आप मेरी याददाश्त का हिस्सा बन जाती थीं। फ़िराक़ पहले और आख़िरी ऐसे इन्सान थे, जिनके व्यक्तित्व ने मुझे साँप की चुम्बकीय आँखों या किसी विशाल तूफ़ानी भँवर की तरह अपने केन्द्र में खींच लिया। जिस दिन से मुलाक़ात हुई उसी दिन से फ़िराक़ के बेशकीमती शब्दों के जवाहर पारों को मैं अपनी डायरी के दामन में समेटने के काम में जुट गया। और एक दिन यह एक-एक शब्द का अनमोल रत्न एक नायाब और वक्त के हाथों भी कभी न लुट सकने वाले खजाने की शक्ल अख्तियार कर गया, जिसके कुछ हिस्से कभी-कभी मेरे संस्मरणात्मक लेखों और पुस्तकों के रूप में उजागर होते रहे। डायरियाँ भरी पड़ी हैं फिराक से। धीरे धीरे इन डायरियों में दर्ज वाकयात और फिराक और उनके शब्द-संसार को पुस्तक की शक्ल में माननीय पाठकों की खिदमत में पेश करता आया हूँ और करता रहूँगा। क्या करूँ। अकेला हूँ। मेरी मजबूरियाँ हैं, तनहाइयाँ हैं, मेरी बीमारियाँ हैं, मेरी समस्याएँ हैं। न कोई यार, न मददगार। बस फिराक साहब की यादों का खुशगवार रेला और गुरुऋण से मुक्त होने की अदम्य अभिलाषा और ईश्वर-कृपा-ये ही मेरे सम्बल हैं, मेरी एकाकी और दुर्गम यात्रा के। जिन्दगी की शाम भी सर पर अपना साया पसारने लगी है। इस ओझल होती हुई सुरमई रौशनी में कितनी तेज दौड़ूँ कि मंजिल पा लूँ। मैं बिल्कुल दौडूँगा नहीं। अटूट आशा और उत्साह लिए चलते-चलते जहाँ पाँव थक जाएँगे गिर पड़ूँगा वही मंजिल होगी-वहीं पर फिराक, मेरे गुरुदेव खड़े होंगे अपने शिष्य रमेश की बाँह पकड़ने और उनका स्वागत करने के लिए।

About the writer

RAMESH CHANDRA DWIVEDI

RAMESH CHANDRA DWIVEDI रमेश चन्द्र द्विवेदी उर्फ़ शौक़—मिर्ज़ापुरी का जन्म 6 अगस्त, 1935 को ग्राम तरकापुर- मिर्ज़ापुरी में हुआ। पिता का नाम पं. शिवदेव द्विवेदी था। फ़िराक़ के कृतित्व व साहित्य की अन्य विधाओं पर हिन्दी में लगभग तीस, अंग्रेज़ी में लगभग चालीस व उर्दू में लगभग पैंतीस लेख प्रकाशित। कवि सम्मेलन व मुशायरों में शिरकत। दर्शन, अध्यात्म और विज्ञान में विशेष रुचि। प्रकाशित कृतियाँ ‘फ़िराक़ साहब’ — (संस्मरण) हिन्दी व उर्दू में। जिश्क्र-ए- फ़िराक़ : 1. मैंने फ़िराक़ को देखा था 2. मेरे नग़्मों को नींद आती है उर्दू की इश्क़िया शायरी, आदमी (नाटक, फ़िराक़ साहब द्वारा जर्मन भाषा से अनूदित), ‘शबनमिस्ताँ’, ‘रम्ज़-ओ-कियानात’, ‘रूह-ए-कायनात’, ‘नौरत्न’ (फ़िराक़ की कहानियाँ), ‘धरती की करवट’, ‘नज़ीर की बानी’, ‘जंज़ीरें टूटती हैं’ और ‘राग-विराग’ आदि पुस्तकों की प्रस्तुति। सम्मान प्रयाग की साहित्य और सांस्कृतिक संस्था अरुणिमा द्वारा ‘साहित्य मणि’ सम्मान, इंटरनेशनल लायन्स क्लब, इलाहाबाद द्वारा साहित्य सौरभ सम्मान।

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