हिन्दी का कथेतर गद्य परम्परा और प्रयोग

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-8956-339-9

लेखक:

Pages:202

मूल्य:रु495/-

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हिन्दी का कथेतर गद्य परम्परा और प्रयोग

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कथेतर गद्य-विधाओं को हिन्दी के रचना-संसार ने जिस तत्परता, उत्साह और गम्भीरता से अपनाया, इनके प्रयोग और उपयोग के प्रतिमान स्थापित किये और इन गद्य विधाओं ने साहित्यिक ही नहीं सामाजिक जीवन में भी जिस तरह की वैचारिक हलचलों को जन्म दिया है, उससे जाहिर है कि आलोचना के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों प्रकारों से कई तरह की और नयी तरह की अपेक्षाएँ जग पड़ी हैं। आलोचना के लिए अब कविता-कहानी जैसे पारम्परिक साहित्य-विधानों में फुरसत नहीं पाने के बहाने, तय है कि बहुत दूर तक और बहुत देर तक चलने वाले नहीं हैं। इसके साथ ही यह भी सच है कि विभिन्न विधाओं के साहित्यिक स्वरूप को स्थायी रूप से तय कर देने वाली मानसिकता को इन कथेतर विधाओं ने अपनी आपसी आवाजाही से पर्याप्त हतोत्साहित किया है। सुधीजन ने इसे 'विधाओं में तोड़फोड़' के रूप में लक्षित करते हुए अक्सर यह स्वीकार किया है कि संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ट, डायरी जैसी विधाएँ एक-दूसरे से जितनी अलग हैं उससे कहीं ज्यादा लगी हुई हैं। यही नहीं, कथा से इतर कही जाने वाली ये विधाएँ बहुधा कथा के भीतर भी अपनी और अपने भीतर भी कथा की पैठ बनाती हैं।

About the writer

VIDYANIWAS MISHRA

VIDYANIWAS MISHRA पं. विद्यानिवास मिश्र (1926-2005) हिन्दी और संस्कृत के अग्रणी विद्वान, प्रख्यात निबंधकार, भाषाविद् और चिन्तक थे। आपका जन्म गोरखपुर जिले के ‘पकड़डीहा’ ग्राम में हुआ। प्रारम्भ में सरकारी पदों पर रहे। तत्पश्चात् गोरखपुर विश्वविद्यालय, आगरा विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ और फिर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, आचार्य, निदेशक, अतिथि आचार्य और कुलपति के पदों को सुशोभित किया। कैलिफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालयों में अतिथि प्रोफेसर एवं ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान सम्पादक भी रहे। अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए आप भारतीय ज्ञानपीठ के ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’, के.के. बिड़ला फाउंडेशन के ‘शंकर सम्मान’, उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी के सर्वोच्च ‘विश्व भारती सम्मान’, भारत सरकार के ‘पद्मश्री’ और ‘पद्मभूषण’, ‘भारत भारती सम्मान’, ‘महाराष्ट्र भारती सम्मान’, ‘हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार’, साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान ‘महत्तर सदस्यता’, हिन्दी साहित्य सम्मेलन से ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ तथा उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी से ‘रत्न सदस्यता सम्मान’ से सम्मानित किये गये और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। बड़ी संख्या में प्रकाशित आपकी पुस्तकों में व्यक्ति-व्यंजक निबन्ध संग्रह, आलोचनात्मक तथा विवेचनात्मक कृतियाँ, भाषा-चिन्तन के क्षेत्रा में शोधग्रन्थ और कविता संकलन सम्मिलित हैं।

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