एलियट और हिंदी साहित्य चिंतन

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5000-343-5

लेखक:मोहनकृष्ण बोहरा

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मूल्य:रु225/-

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हिंदी-जगत को टी.एस. एलियट की आलोचना से परिचित कराने का श्रेय मुख्य रूप से अज्ञेय को है। ‘त्रिशंवु$’ में उन्होंने एलियट वे$ बहुचर्चित निबंध ‘टेªडिशन एंड इंडिविजुअल टेलेण्ट’ का ‘रूढ़ि और मौलिकता’ शीर्षक से ‘लगभग भावानुवाद’ किया है। हिंदी-आलोचना में अज्ञेय और एलियट की तुलना का उपक्रम इसी आधार पर प्रारंभ हुआ जान पड़ता है। स्वयं अज्ञेय ने अपनी साहित्यिक सजातीयता रॉबर्ट ब्राउनिंग और डी.एच. लॉरेंस वे$ साथ ज्ञापित की है, लेकिन साहित्य-चिंतक अज्ञेय पर प्रभाव एलियट का ही अधिक है। इस प्रभाव को उनकी दृष्टि का वे$ंद्र-बिंदु नहीं कहा जा सकता लेकिन इसका आकर्षण उनमें प्रबल रहा है और इसने उनकी दृष्टि का संस्कार भी किया है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। हिंदी-आलोचना में एलियट वे$ साहित्य-चिंतन का प्रभाव, अज्ञेय वे$ बाद, प्रमुख रूप से डॉ॰ देवराज की साहित्य-चिंता पर दिखाई देता है। अज्ञेय ने लिखा है कि ‘एलियट की बात सोचने लायक होती है।1 डॉ॰ देवराज ने लगभग उसी स्वर में बल्कि उससे आगे बढ़कर, कहा है कि ‘एलियट की प्रत्येक उक्ति विचारणीय होती है।’ लेकिन उसवे$ प्रभाव का ग्रहण दोनों ने अपने-अपने ढंग से किया है। अज्ञेय अधिकांशतः एलियट वे$ सृजन-प्रक्रिया विषयक चिंतन की ओर आकर्षित हुए हैं जबकि डॉ॰ देवराज में यह पहलू लगभग अछूता रहा है; उन्होंने प्रतिमान-निरूपण वे$ संदर्भ मंे किए गए उसवे$ चिंतन-मनन से प्रभाव ग्रहण किया है।

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About the writer

MOHAN KRISHAN BOHRA

MOHAN KRISHAN BOHRA जन्म : 27 जुलाई 1939, जोधपुर (राजस्थान)। शिक्षा: एम.ए. हिन्दी एवं अंग्रेजी सेवा-काल: 1962 से 1997 तक राजस्थान सरकार के कॉलेज शिक्षा विभाग में कार्यरत, राजकीय महाविद्यालय, ब्यावर एवं सिरोही में प्राध्यापक एवं स्नातकोत्तर विभागाध्यक्ष पद पर कार्य, राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स, जयपुर और सांभर, बाँदीकुई स्नातक महाविद्यालयों में प्राचार्य, श्री कल्याण राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में स्नातकोत्तर प्राचार्य, राजस्थान कॉलेज-शिक्षा विभाग, जयपुर में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्य करते हुए सेवानिवृत्त।

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