हिन्दी आलोचना का सैद्धान्तिक आधार

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-210-X

लेखक:संपादक : डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल

Pages:638

मूल्य:रु500/-

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हिन्दी की आधुनिक सैद्धान्तिक समीक्षा में प्रायः तीन प्रकार की प्रवृत्तियाँ सक्रिय री हैं-(1) संस्कृत काव्यशास्त्र की परम्परागत सैद्धाान्तिकता को विशिष्ट शास्त्रीयता से पोषित करने वाली प्रवृत्तियाँ (2) भारतीय काव्यशास्त्र की सैद्धान्तिकता को अपर्याप्त तथा अप्रासंगिक मानकर पाश्चात्य सैद्धान्तिकता को एकमात्र आदर देने वाली प्रवृत्तियाँ, (3) भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-सिद्धान्तों की तुलना एवं समन्वय दृष्टि से विकसित-परिष्कृत होने वाली प्रवृत्तियाँ। हिन्दी की आधुनिक सैद्धान्तिक समीक्षा को आचार्य रामचन्द्र शुकल की सैद्धान्तिक दृष्टि ने दृढ़ आधार प्रदान किया है। आचार्य शुकल की इसी परम्परा को परवर्ती हिन्दी-समीक्षा ने लगातार विकास एवं समृद्धि से मण्डित किया है। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी और आचार्य नगेन्द्र से लेकर कवि-आलोचक अज्ञेय और मुक्तिबोध ने इसी पथ की शक्ति एवं सम्भावनाओं को अधुनातन ज्ञान-विज्ञान की नवीन प्रवृत्तियों एवं पद्धतियों से सम्बद्ध करते हुए महत्त्व-प्रतिष्ठा की है। आचार्य शुक्ल परवर्ती सैद्धान्तिकता में पाश्चात्य काव्य-चिन्तन सतही न रहकर नवीन व्याख्याओं के साथ प्रामाणिक तथा गहरा होता गया है-जिसके परिणामस्वरूप हिन्दी की आधुनिक सैद्धान्तिकता ने व्यापकता एवं समृद्धि दोनों को एक साथ धारण किया है। पाश्चात्य काव्यशास्त्र के जिन स्रोतों ने हिन्दी की आधुनिक समीक्षा को नया जोश प्रदान किया है, उसकी उर्वरा-शक्ति को नवीन चेतना का दान किया है; उसमें अंग्रेजी-समीक्षा का नाम अग्रगण्य है। भारतीय समीक्षा की उन्नीसवीं शती का उत्तरार्द्ध एवं बींसवीं शती इन्हीं प्रेरणा-स्रोतों के उपयोग की रही हैं। अध्ययन-अध्यापन तथा अनुवाद के द्वारा पाश्चात्य समीक्षा ने एक नया रंग और ढंग दिया है। स्वयं अंग्रेजी-समीक्षा पश्चिम के सभी चिन्तनशील देशों से जुड़कर ही समृद्ध हो पायी है और इसी से जुड़कर हिन्दी की आधुनिक सैद्धान्तिकता ने सम्पूर्ण पाश्चात्य-जगत से अविच्छिन्न सम्बन्ध-सम्पर्क स्थापित किया है। यूरोपीय आलोचना सम्बन्ध-सम्पर्क स्थापित किया है।

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About the writer

ED. Dr. KRISHNA DUTT PALIWAL

ED. Dr. KRISHNA DUTT PALIWAL जन्म : 4 मार्च, 1943 को सिकंदरपुर, जिला फर्रुखाबाद (उ.प्र.) में। प्रकाशन : भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य-संसार, आचार्य रामचंद्र शुक्ल का चिंतन जगत्, मैथिलीशरण गुप्‍त : प्रासंगिकता के अंत:सूत्र, सुमित्रानंदन पंत, डॉ. अंबेडकर और समाज-व्यवस्था, सीय राम मय सब जग जानी, सर्वेश्‍वरदयाल सक्सेना, हिंदी आलोचना के नए वैचारिक सरोकार, गिरिजा कुमार माथुर, जापान में कुछ दिन, डॉ. अंबेडकर : समाज-व्यवस्था और दलित-साहित्य, उत्तर आधुनिकता की ओर, अज्ञेय होने का अर्थ, उत्तर-आधुनिकतावाद और दलित साहित्य, नवजागरण और महादेवी वर्मा का रचनाकर्म : स्त्री-विमर्श के स्वर, अज्ञेय : कवि कर्म का संकट, निर्मल वर्मा (विनिबंध) दलित साहित्य : बुनियादी सरोकार, निर्मल वर्मा : उत्तर औपनिवेशिक विमर्श। लक्ष्मीकांत वर्मा की चुनी हुई रचनाएँ, मैथिलीशरण गुप्‍त ग्रंथावली का संपादन। पुरस्कार/सम्मान : हिंदी अकादमी पुरस्कार, दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन सम्मान, तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय, जापान द्वारा प्रशस्ति-पत्र, राममनोहर लोहिया अतिविशिष्‍ट सम्मान, सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान, साहित्यकार सम्मान, विश्‍व हिंदी सम्मान, विश्‍व हिंदी सम्मेलन, न्यूयॉर्क में सम्मानित। दिल्ली विश्‍वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे तथा तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज में विजिटिंग प्रोफेसर।

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