हिन्दी गद्य इधर की उपलब्धियाँ

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ISBN:81-8143-217-7

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पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी गद्य की ऐसी गौरवपूर्ण-विस्मयकारी उपलब्धियाँ प्रकाश में आयी हैं जो किसी भी भाषा के साहित्य के लिए स्पृहणीय हैं। ऐसी कृतियों की वक्ती चर्चा, यत्किंचित्, पत्र-पत्रिकाओं में होती है। और फिर कुछ समय पश्चात् वह अनुगूंज भी समाप्त हो जाती है। इस क्रम में कितनी ही रचनाएँ समय के गर्त में गुम हो जाती हैं। समीक्षा पर प्रायः ही यह दोषारोपण होता है कि वह समकालीन रचना-कर्म के समानान्तर नहीं चल पाती है। प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रखत कथा-आलोचक पुष्पपाल सिंह ने अपने गम्भीर चिन्तन और गहन तल-स्पर्शिनी-दृष्टि से हिन्दी गद्य के श्रेष्ठ रेखांकन का महत्वपूर्ण कार्य किया है। इनमें से अधिकांश लेख देश की शीर्ष पत्रिकाओं में प्रकाशित हो कर चर्चा में आये हैं, वस्तुतः तुर्ता-फुर्ती में लिखी गयी वक्ती समीक्षाओं से ये समीक्षा-आलेख इस दृष्टि से अपनी अलग पहचान बनाते हैं कि समय की धूल-धक्कड़ के शान्त हो जाने पर रचनाओं पर सम्यक् दृष्टि से गम्भीरतापूर्वक विचार किया गया है। एक-एक कहानी पर इतनी विस्तृत विचारणा कथा-समीक्षा को एक निजता ओर प्रौढ़ता प्रदान करती है। लेखक का आग्रह यह नहीं है कि मात्र यही हिन्दी गद्य का श्रेष्ठ है, इस क्रम में और भी रचनाओं पर विचार-पुनर्विचार की आवश्यकता बता कर वे समीक्षा का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त वह ग्रन्थ गुट निर्पेक्ष, बेबाक और निर्भीक समीक्षा-कर्म का मानक है।

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PUSHPPAL SINGH

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