Yahin Kahin…Bahut Door

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5000-294-0

Author:MOHAN MAHARSHI

Pages:48

MRP:Rs.95/-

Stock:In Stock

Rs.95/-

Details

यहीं कहीं...बहुत दूर

Additional Information

यह नाटक... यह एक तथ्य है कि मेरा हर नया नाटक पीछे लिखे गये नाटकों से, हर दृष्टि से एकदम भिन्न होता है। ऐसा मैं जानबूझ कर नहीं करता। आइनस्टाइन के सापेक्षतावाद जैसे जटिल विषय से जूझने के बाद मैंने कई तरह के अलग अलग शिल्प तथा कथ्यों के साथ प्रयोग किये। तीव्रता से बदलते हुए आज के सामाजिक परिवेश में मानवीय संबंधों के एकदम चौंकानेवाले आयाम उभर कर सामने आये हैं। समलैंगिकता इसी प्रकार का विषय है जिसे हम चारों ओर देखते हैं, अनुभव करते हैं, लेकिन सभी, यहाँ तक कि बहुत से कलाकार बंधु भी, इस विषय की पड़ताल से बच कर निकल जाते हैं। यह नाटक मूलतः सिमरन और वैजयंती की प्रेमकथा है। सिमरन यदि समंदरी सैलाब है तो वैजयंती, ठंडी, दरार खायी शिला। कॉलेज प्रोफेसर ईश्वर दत्त एक आम पुरुष है, जो सिमरन के अनोखेपन से प्रभावित तो है ही, उसे मन की गहराइयों से प्यार भी करता है। कह सकते हैं कि वह नाटक के त्रिकोण को पूरा करने की क्षमता रखता है पर संभवतः कर नहीं पाता। मोहन महर्षि नयी दिल्ली

About the writer

MOHAN MAHARSHI

MOHAN MAHARSHI मोहन महर्षि लगभग पचास वर्षों से मोहन महर्षि भारतीय रंगमंच में सक्रिय रहे हैं। 1940 में जन्मे मोहन महर्षि ने एक निर्देशक, नाटककार, मंच सज्जाकार एवं अध्यापक के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक होने के अतिरिक्त उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण पदों पर देश विदेश में काम किया। सन 1973 में, विदेश मंत्रालय ने, प्रधानमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार के रूप में उन्हें डॉ. अंजला महर्षि के संग मॉरिशस भेजा, जहाँ उन्होंने भारतीय भाषाओं में रंगमंच की नींव डाली। उसके पश्चात 1980 में पंजाब विश्वविद्यालय के रंगमंच विभाग में प्रोफ़ेसर तथा विभागाध्यक्ष के रूप में वे कार्यरत रहे। 2002 में सह-उपकुलपति के पद से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया। महर्षि की अनेकानेक मंच प्रस्तुतियों में से आइनस्टाइन, राजा की रसोई, दीवार में एक खिड़की रहती थी, मैं इस्तांबुल हूँ, जोसेफ़ का मुक़दमा, विद्योत्त्मा एवं डियर बापू सब से अधिक चर्चित नाटक रहे हैं। दर्जनों रूपांतरों और अनेक विदेशी नाटकों के अनुवादों के अतिरिक्त उन्होंने 8 मौलिक नाटक लिखे हैं। इन में आइनस्टाइन, राजा की रसोई, डियर बापू, मैं इस्तांबुल हूँ और महाकवि कालिदास के जीवन पर आधारित विद्योत्तमा विशेष तौर पर उल्लेखनीय हैं। इस समय वे नाट्यलेखन और निर्देशन के अतिरिक्त अतिथि प्राध्यापक के रूप में कई महत्त्वपूर्ण शिक्षा संस्थानों से जुड़े हैं, जैसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी दिल्ली, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कानपुर, हैदराबाद विश्वविद्यालय, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिजायन अहमदाबाद, फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट पुणे, दून स्कूल देहरादून आदि। वे दिल्ली की प्रमुख नाट्य संस्था नटवा के अध्यक्ष हैं। श्री मोहन महर्षि को 1993 में संगीत नाटक अकादेमी ने नाट्य जगत के सर्वोच्च पुरस्कार से नवाज़ा।

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