ISHWAR KI AAKHN

Format:Hard Bound

ISBN:81-5570-688-0

Author:UDAY PRAKASH

Pages:402

MRP:Rs.750/-

Stock:In Stock

Rs.750/-

Details

ईश्वर की आँख

Additional Information

दरअसल हम जिस शताब्दी के अन्त में हैं, उस शताब्दी की सारी नाटकीयताएँ अब ख़त्म हो चुकी हैं। हम ग्रीन रूम में हैं। अभिनेताओं का ‘मेकअप' उतर चुका है। वे बूढे जो दानवीर कर्ण, धर्मराज या किंग लियर की भूमिका कर रहे थे अब अपने मेहनताने के लिए झगड़ रहे हैं। वे अभिनेत्रियाँ जो द्रोपदी, सीता, क्लियोपेट्रा या आम्रपाली का रोल कर रही थीं, अपनी झुर्रियाँ ठीक करती हुई ग्राहक पटा रही हैं। आसपास कोई अख़्मातोवा या मीरा नहीं है। कोई पुश्किन, प्रूस्त या निराला नहीं है। देखो उस खद्दरधारी गाँधीवादी को, जो संस्थानों का भोज डकारता हुआ इस अन्यायी हिंस्र यथार्थ का एक शान्तिवादी भेड़िया है। ‘सरोज स्मृति' या ‘राम की शक्तिपूजा' की काव्य संरचना में अंतर्याप्त रचनाकार की अशक्त, निहत्थी और निपट असहाय अवस्थिति कहीं नहीं दिखती। ब्रूनो शुल्त्जक्र की स्ट्रीट ऑफ क्रोकोडायल्स' और 'सैनिटोरियम अंडर द साइन ऑफ ऑवरग्लास' का या काफ्क्रका का कई कहानियों का असंगत और लगभग अर्द्धमूर्च्छा की दशा में पहुँचा सृजनात्मक लेकिन यंत्रणाग्रस्त मानस यहाँ नहीं है। यहाँ वह अंतर्द्वद्व भी नहीं है, जो ‘अँधेरे में' या 'ब्रह्मराक्षस' के मुक्तिबोध को हिन्दी का मिल्टन बनाता है। यह एक संक्रांत काल है। लेखक का भाषा से, वक्ता का वक्तृता से, कर्ता का कर्म से विच्छेद हो चुका है। नतीजा है परम स्वतंत्रता। कथनी और करनी का चरम अलगाव। लेखन भी राजनीति या व्यापार की तरह ताकत हासिल करने का एक माध्यम है। लेखक के रूप में अब मिडिल स्कूल में मुदर्रिसी करने वाले मुक्तिबोध नहीं, ‘पॉवर मांगर्स' टहल रहे हैं।

About the writer

UDAY PRAKASH

UDAY PRAKASH उदय प्रकाश 1952, मध्य प्रदेश के शहडोल (अब अनूपपुर) ज़िले के गाँव सीतापुर में जन्म। सागर वि.वि. सागर और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली से शिक्षा प्राप्त। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और इसके मणिपुर केन्द्र में लगभग चार वर्ष तक अध्यापन। संस्कृति विभाग, मध्य प्रदेश, भोपाल में लगभग दो वर्ष विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी। इसी दौरान ‘पूर्वग्रह’ का सहायक सम्पादन। नौ वर्षों तक टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के समाचार पाक्षिक ‘दिनमान’ के सम्पादकीय विभाग में नौकरी। बीच में एक वर्ष टाइम्स रिसर्च फ़ाउंडेशन के स्कूल ऑफ़ सोशल जर्नलिज्म में अध्यापन। लगभग दो वर्ष पी.टी.आई. (टेलीविज़न) और एक वर्ष इंडिपेंडेंट टेलीविज़न में विचार और पटकथा प्रमुख। कुछ समय ‘संडे मेल’ में वरिष्ठ सहायक सम्पादक रहे। इन दिनों स्वतन्त्र लेखन तथा फ़िल्म और मीडिया के लिए लेखन। ‘सुनो कारीगर’, ‘अबूतर-कबूतर’, ‘रात में हारमोनियम, ‘एक भाषा हुआ करती है’, ‘नयी सदी के लिए चयन: पचास कविताएँ’ (कविता संग्रह); ‘दरियाई घोड़ा’, ‘तिरिछ’, ‘और अन्त में प्रार्थना’, ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’, ‘पीली छतरी वाली लड़की’, ‘दत्तात्रोय के दुख’, ‘मोहन दास’, ‘अरेबा परेबा’, ‘मैंगोसिल’ (कहानी संग्रह); ‘ईश्वर की आँख’, ‘अपनी उनकी बात’ और ‘नयी सदी का पंचतन्त्र’ (निबन्ध, आलोचना) पुस्तकें प्रकाशित। इसके अलावा लगभग 8 पुस्तकें अंग्रेज़ी में प्रकाशित। ‘पीली छतरी वाली लड़की’ (उर्दू), ‘तिरिछ अणि इतर कथा’, ‘अरेबा परेबा’ (मराठी), ‘मोहन दास’ कन्नड़ में प्रकाशित, पंजाबी, उड़िया, अंग्रेज़ी में प्रकाश्य। ‘लाल घास पर नीले घोड़े’ (मिखाइल शात्रोव के नाटक का अनुवाद और रूपान्तर), ‘कला अनुभव’ (प्रो. हरियन्ना की सौन्दर्यशास्त्रीय पुस्तक का अनुवाद), ‘इन्दिरा गाँधी की आखिरी लड़ाई’ (बी.बी.सी. संवाददाता मार्क टली-सतीश जैकब की किताब का हिन्दी अनुवाद), ‘रोम्यां रोलां का भारत’ (आंशिक अनुवाद और सम्पादन) का अनुवाद। भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, ओमप्रकाश साहित्य सम्मान, श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार, मुक्तिबोध पुरस्कार, साहित्यकार सम्मान, हिन्दी अकादेमी, दिल्ली, रामकृष्ण जयदयाल सद्भावना सम्मान, पहल सम्मान, कथाक्रम सम्मान, पुश्किन सम्मान, द्विजदेव सम्मान, साहित्य अकादेमी पुरस्कारों से पुरस्कृत।

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