HINDI SWACHCHHANDATAVADI KAVYA

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ISBN:81-7055-173-0

Author:PREM SHANKAR

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MRP:Rs.395/-

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भारतीय स्वच्छन्दतावाद रचनाशीलता की कई दिशाओं में सक्रिय रहा है, यहाँ तक कि चित्राकला पर भी उसका प्रभाव देखा जा सकता है पर कार्य को काव्य तक सीमित रखकर, उस पर विचार करने के मूल में आशय यही था कि विवेचन किंचित तलस्पर्शी हो सके। पूर्वांचल से बांग्ला, असमिया, उड़िया; दक्षिण से मलयालम, तमिल, तेलुगु, कन्नड; पश्चिम-उत्तर से मराठी, गुजराती, पंजाबी, उर्दू को लिया गया है। इनमें से कुछ में स्वच्छंतावादी काव्य की विशेष सक्रियता रही है, जैसे बंगाल में। पर मराठी, गुजराती, भाषाएँ भी है, जहाँ इतिहासकारों से स्वच्छन्दतावाद युग की स्व्तन्त्र परिकल्पना नहीं की, यद्यपि प्रवृत्तियाँ वहाँ भी देखी जा सकती हैं। नामों में भी परिवर्तन है, जैसे हिन्दी में छायावाद, मलयालम में कल्पनाप्रधान काव्य, तेलुगु में भाव कविता, जिसमें देश प्रेम की कविताएँ भी सम्मिलित हैं। बांग्ला तथा हिन्दी में स्वच्छंदतावाद की कई दिशाएँ हैं और उसका वैविध्व उल्लेखनीय है जिसमें सामाजक चेतना तक आती है। प्रमुख हिन्दी कवियों को स्वतन्त्र अध्याय दिये गये हैं। तुलनात्मक अध्ययन का कार्य सरल नहीं होता, पर प्रयत्न किया गया है कि भारतीय स्वच्छंदतावाद की समान रेखाओं की खोज की जाये, ताकि आधुनिक जागरण की रचनात्मक अभिव्यक्ति से सही परिचय भी हो सके। विवेचित भाषाओं में महान कवि हैं, जिन्होंने अपने समय को तो आन्दोलित किया ही, आगे आने वाली पीढ़ियाँ भी उनकी पूर्ण अनदेखी नहीं कर सकीें। निर्विवाद है कि रवीन्द्र का विराट व्यक्तित्व समस्त आधुनिक भारतीय रचनाशीलता पर अपनी प्रभावी छाया डालता है। स्वच्छंदतावाद के वैविध्य के लिए वे रचना के शीर्ष पर हैं, प्रेम-सौन्दर्य से लेकर जातीय चेतना और व्यापक मानववाद तक। महाकवि की अन्तिम कविताओं में है ‘सम्मिलित गान’ (1941): ‘मैं पृथ्वी का कवि हूँ, पृथ्वी से जहाँ भी जो ध्वनि उठती है/मेरी बाँसुरी के सुर में, उसका स्पन्दन उसी समय जाग उठता है।’ भारतीय स्वच्छंदतावाद स्वयं को अतिक्रान्त करता है, जो विकासमान व्यक्तित्व का परिचायक है।

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