HINDI KE AANCHALIK UPANYASON MEIN MULYA-SANKRAMAN

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ISBN:81-7055-533-7

Author:DR. VEDPRAKASH AMITABH

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MRP:Rs.250/-

Stock:In Stock

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बीसवीं शती के छठे-सातवें दशक में ‘आँचलिकता’ एक विस्फोट के तौर पर उभरी थी और समूचा औपन्यासिक परिदृश्य उसकी ऊर्जा की कौंध से दीप्त हो गया था। शुरू से ही आँचलिक उपन्यासों के मूल्यांकन के दो विरोधी छोर रहे हैं। किन्तु प्रशंसा और निन्दा के अतिरेक के मध्य वस्तुनिष्ठ-संतुलित समीक्षा दृष्टि ही विश्वसनीय ठहराती है। वेदप्रकाश अमिताभ का यह समीक्षात्मक प्रयास आँचलिक उपन्यासों के प्रति किसी आग्रही दृष्टिकोण या निषेध-दृष्टि से प्रेरित-पोषित नहीं है। आँचलिक उपन्यासों की उपलब्धियोंµविशेषतः अपने संक्रमणशील परिवेश का साक्ष्य बनने की शक्ति का इसमें उद्घाटन हुआ है। लेकिन इस कृति में समीक्षा-कर्म केवल उपलब्धि या विशेषता को रेखांकित करने तक सीमित नहीं है, आँचलिक उपन्यास के समग्र सोच की सीमाएँ भी उभर कर सामने आयी हैं। यह कृति न केवल आँचलिक उपन्यासों के अभिप्राय से सीधा संवाद करती है, अपितु उसकी प्रासंगिकता का निर्धारण भी करती है। आँचलिक उपन्यासों के अध्येताओं और पाठकों को यह समीक्षा-कृति कुछ ‘अभिनव’ और ‘विचारोत्तेजक’ सामग्री देने में सक्षम है।

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About the writer

DR. VEDPRAKASH AMITABH

DR. VEDPRAKASH AMITABH डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ जन्म: गाजीपुर (उ.प्र.), 1947 ई.। प्रकाशित आलोचना-साहित्य 1. नयी कहानी: प्रमुख हस्ताक्षर 2. राजेन्द्र यादव: कथा यात्रा 3. हिन्दी कहानी के सौ वर्ष 4. समकालीन काव्य की दिशाएँ 5. हिन्दी साहित्य: विविध प्रसंग सम्प्रति: धर्म समाज कॉलेज, अलीगढ़ के हिन्दी विभाग में रीडर पद पर कार्यरत और त्रौमासिक ‘अभिनव प्रसंगवश’ का संपादन।

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