JAPAN KE VIVIDH RANG-RAAG

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-8143-787-7

Author:RITARANI PALIWAL

Pages:172

MRP:Rs.350/-

Stock:In Stock

Rs.350/-

Details

जापानी जीवन, समाज और संस्कृति से जुड़े ये आलेख एवं अनुवाद वस्तुतः भारत-जापान-संवाद का ही एक रूप हैं। भारतीय मिट्टी और हवा में रचे-पचे देशी मन की जापानी समाज, साहित्य और संस्कृति में यह अंतर्यात्रा एक ओर तो अतीत और वर्तमान के बीच सेतु बनाती रही है दूसरी ओर अपने भारतीय होने के बोध को जाग्रत रखते हुए जपान और भारत के रिश्तों में नई कड़ियाँ जोड़ती रही है। साहित्य की सजग पाठक और रंग-कलाओं की जारूक दर्शक होने के कारण मेरे मन में नए-पुराने एशियायी संदर्भों की तुलना और सांस्कृतिक-सामाजिक आदान-प्रदान की विवेचना भी लगातार चलती रही है। इस तरह भारत के साथ-साथ जापान भी इन लेखों में मौजूद रहा है।

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About the writer

RITARANI PALIWAL

RITARANI PALIWAL जन्म: 3 सितम्बर 1949, खैरगढ़, ज़िला - मैनपुरी (उत्तर प्रदेश)। शिक्षा: हिन्दी और अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद नाटक और रंगमंच पर हिन्दी में पीएच.डी. और डी.लिट्. किया। जापान में रहते हुए जापानी नाटक और रंगमंच को देखने-जानने-समझने का अवसर मिला। साहित्य, संस्कृति और समसामयिक विषयों पर पत्रिकाओं में लेखन। प्रमुख प्रकाशन: यूनानी और रोमी काव्यशास्त्र, रंगमंच और जयशंकर प्रसाद के नाटक, जयशंकर प्रसाद और मोहन राकेश की रंग-दृष्टि का तुलनात्मक अध्ययन, जापानी रंग-परम्परा: नोह, काबुकी और बुनाराकु, जापान के विविध रंग-राग, अज्ञेय के सृजन में जापान, अनुवाद की सामाजिक भूमिका, अनुवाद प्रक्रिया और परिदृश्य। प्रेमचन्द के उपन्यास कर्मभूमि का अंग्रेजी में अनुवाद, जापानी मन्योशु कविताओं का हिन्दी में अनुवाद। इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर तथा मानविकी विद्यापीठ की निदेशक रहीं। सम्प्रति: सस्ता साहित्य मंडल की सदस्य सचिव।

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