BEGHMAT KE AANSU

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-299-1

Author:KHWAZA HASAN NIZAMI

Pages:128

MRP:Rs.150/-

Stock:Out of Stock

Rs.150/-

Details

बेगमात के आँसू

Additional Information

'बेगमात के आँसू' मरहूम ख्वाज़ा हसन निज़ामी की प्रसिद्ध और शायद सबसे लोकप्रिय कृति है, जिसमें 1857 के ऐतिहासिक घटनाक्रम के बाद दिल्ली के शाही खानदान के लोगों को जो दमन और उत्पीड़न झेलना पड़ा, दाने-दाने को मोहताज़ होकर जो दुर्दिन देखना पड़ा, उसका सजीव और मार्मिक चित्र उपस्थित हुआ है। 'बेगमात के आँसु' के नाम से पाठकों को यह भ्रम हो सकता है, कि इसमें सिर्फ़ शाही परिवार की महिलाओं की आपबीती ही बयान की गई होगी, लेकिन ऐसी बात है नहीं। अगर यहाँ बादशाह बहादुरशाह की पोती सुल्ताना बानू, बादशाह की बेटी कुलसुम जमानी बेगम और नातिन जीनत जमानी बेगम जैसी शाही खानदान की। अनेकानेक महिलाओं-युवतियों की दुरवस्था से हमारा सामना होता है, तो बहादुरशाह के दादा शाह आलम के 'धेवते माहे आलम और उसके पिता मिर्ज़ा नौरोज़ हैदर, शाही खानदान के मिर्ज़ा दिलदार शाह के दुधमुंहे बेटे, यहां तक कि ख़ुद बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र जैसे अनेक राजपुरुषों और बच्चों की व्यथा कथा भी हमारी संवेदना को झंझोड़ती है। मानवीय करुणा और इतिहास की त्रासदी से सराबोर इस यादगार कृति का हिंदी में अनुवाद अपने समय के प्रसिद्ध पत्रकार श्रीराम शर्मा ने किया है।

About the writer

KHWAZA HASAN NIZAMI

KHWAZA HASAN NIZAMI ख्वाज़ा हसन निज़ामी मरहूम ख्वाज़ा हसन निज़ामी का जन्म इस्लामी पंचांग के अनुसार 2 मुहर्रब 1296 हिजरी (तद्नुसार 1876 ई. के आसपास) को हुआ था। उनके नाना हजरत ख्वाज़ा गुलाम हसन, न सिर्फ़ 1857 के गदर के दौरान जीवित थे। बल्कि जब हमायूँ के मकबरे से बहादुरशाह ज़फर को अंग्रेज़ी फ़ौज ने गिरफ्तार किया, तब वे वहाँ मौजद भी थे। निज़ामी साहब ने लगभग 80 वर्ष की उम्र पाई और इस लम्बी उम्र में उन्होंने अध्यात्म और इतिहास की बहुत-सी किताबें लिखीं, जिनकी संख्या सैकड़ों में है। कुरान का पहला हिंदी तर्जुमा उन्होंने ही किया था और खट ही प्रकाशित किया था। कृष्ण और नानक की जीवनियाँ भी उन्होंने उर्दू में लिखी थीं, जो अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय हई थीं। निज़ामी साहब पर वेदांत दर्शन का गहरा असर था और उससे प्रेरित होकर पैगम्बरुल इस्लाम के बारे में उन्होंने एक रचना 'मन के इक धोबी' शीर्षक से रची थी, जिसमें हजरत मोहम्मद को धोबियों का चौधरी कहा गया है। इस धोबी से आशय उस दिव्यत्व से है, जो आदमी के बाहर-भीतर का सारा मैल धो दे। दिलचस्प बात यह है कि अभी हाल में पाकिस्तान सरकार ने निज़ामी साहब की उक्त रचना पर पाबंदी लगा दी है। लेकिन भारत के राष्ट्रीय आंदोलन और इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से, निज़ामी साहब का महत्व उनकी 1857 की दिल्ली से संबंधित किताबों के लिए है। यद्यपि 1857 की ऐतिहासिक घटनाओं पर रोशनी डालनेवाली बहत-सी उल्लेखनीय सामग्री अब तक आ चुकी है, तब भी, ख्वाज़ा हसन निज़ामी की कृतियों का अपना अलग महल है, क्योंकि वे गहरी मानवीय दृष्टि और राष्ट्रीय भावना से उस ऐतिहासिक सामग्री के आधार पर लिखी गई हैं। जहाँ इतिहासकार और शोधार्थी प्रायः नहीं पहुँच पाते। 1857 से संबंधित निज़ामी साहब की उन महत्त्वपूर्ण कृतियों में से कुछेक के नाम इस प्रकार हैं : 1. गदर की सुबहशाम, 2. बेगमात के आँस. 3. अंग्रेजों की विपदा, 4. गिरफ्तारशुदा खुतूत, 5. बहादुरशाह ज़फ़र व मटकाफ के रोज़नामचे, 6. ग़ालिब का रोजनामचा, और। 7. बहादरशाह पर मुकदमा। उन्होंने कई अखबार और रिसाले भी समय-समय पर निकाले, जिनमें से 'मनादी' (1926 में शुरुआत) का प्रकाशन मरहूम निज़ामी साहब के सुपुत्र ख्वाजा हसन सामी निजामी अब तक जारी रखे। हुए हैं। ख्वाज़ा हसन निज़ामी का निधन 31 जुलाई 1955 को हुआ।।

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