NIJGHARE PARDESI

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-116-2

Author:RAMNIKA GUPTA

Pages:106

MRP:Rs.125/-

Stock:In Stock

Rs.125/-

Details

"हजारों बरसों से या कहूं सदियों से आदिवासियों को खदेड़ने का काम जारी है । उन्हें जंगलों में आदिम जीवन जीने के लिए मजबूर कर सभ्यता से दूर रखने की साजिश भी इस बीच जारी रही और जारी रहा उनका शोषण और दोहन । उनकी संस्कृति को न तो यहाँ के वासियों ने पनपने या विकसित होने दिया और न ही उसे आत्मसात कर मूलधारा में शामिल होने दिया । उल्टे हमेशा उन्हें असभ्य, आदिम या जंगली की पहचान देकर उनमें हीन भावना भरी जाती रही, जिससे इन पर उनका वर्चस्व कायम रहे । फलस्वरूप आदिवासियों के समाज का विकास ठहर-सा गया, सोच का विकास रुक गया और रुक गई उनकी संस्कृति और भाषा का विकास । परंपरा और अंधविश्वास से जुड़ा यह समाज, बस जीने की चाह के बल पर कठिन-से-कठिन परिस्थितियों का अपने कठिन श्रम से मुकाबला करता रहा दीन-दुनिया से बेखबर । लेकिन इस सबके बावजूद उसने अपनी पहचान आदिवासी के रूप में कायम रखी । आदिवासी यानी मूल निवासी यानी भारत का मूल बाशिंदा यानी इस धरती का पुत्र जो धरती और प्रकृति के विकास के साथ ही पैदा हुआ, पनपा, बढ़ा और जवान हुआ- प्रकृति का सहयात्री और सहजीवी जो सहनशीलता की सीमा तक सहन करता पर अन्याय के विरोध में भी खड़ा हो जाता । भले उसे गूंगा बना दिया गया था । अभिव्यक्ति की ताकत नहीं थी उसके पास, पर अन्याय हद से गुजर जाने पर उसके हाथ गतिशील हो उठते । उसका सारा आक्रोश, सारा गुस्सा तीरों में भरकर बरस पड़ता । गुलेलों के पत्थरों से वह अपना प्रतिकार जाहिर करता और वापस जंगलों में तिरोहित हो जाता ।

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RAMNIKA GUPTA

RAMNIKA GUPTA रमणिका गुप्ता जन्म: 22 अप्रैल, 1930, सुनाम (पंजाब) शिक्षा: एम.ए., बी.एड. बिहार/झारखंड की पूर्व विधायक एवं विधान परिषद् की पूर्व सदस्य। कई गैर-सरकारी एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से सम्बद्ध तथा सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक कार्यक्रमांे में सहभागिता। आदिवासी, दलित महिलाओं व वंचितों के लिए कार्यरत। कई देशों की यात्राएँ। विभिन्न सम्मानों एवं पुरस्कारों से सम्मानित। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित कृतियाँ: निज घरे परदेसी, सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे (स्त्राी-विमर्श)। आदिवासी स्वर: नयी शताब्दी (सम्पादन)। इसके अलावा छह काव्य-संग्रह, चार कहानी-संग्रह एवं तैंतीस विभिन्न भाषाओं के साहित्य की प्रतिनिधि रचनाओं के अतिरिक्त ‘आदिवासी: शौर्य एवं विद्रोह’ (झारखंड), ‘आदिवासी: सृजन मिथक एवं अन्य लोककथाएँ’ (झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात और अंडमान-निकोबार) का संकलन-सम्पादन। अनुवाद: शरणकुमार लिंबाले की पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्रा’ का मराठी से हिन्दी में अनुवाद। इनके उपन्यास ‘मौसी’ का अनुवाद तेलुगु में ‘पिन्नी’ नाम से और पंजाबी में ‘मासी’ नाम से हो चुका है। ज़हीर गाजीपुरी द्वारा उर्दू में अनूदित इनका कविता-संकलन ‘कैसे करोगे तकसीम तवारीख को’ प्रकाशित। इनकी कविताओं का पंजाबी अनुवाद बलवरी चन्द्र लांगोवाल ने किया जो ‘बागी बोल’ नाम से प्रकाशित हो चुका है। आदिवासी, दलित एवं स्त्राी मुद्दों पर कुल 38 पुस्तकें सम्पादित। सम्प्रति: सन् 1985 से ‘युद्धरत आम आदमी’ (मासिक हिन्दी पत्रिका) का सम्पादन। सम्पर्क: ए-221, ग्राउंड फ्लोर, डिफेंस कॉलोनी, नयी दिल्ली-110024

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