BIHAR DEKHANE WALON KI AANKH MEIN HAI

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-274-6

Author:VIJAY NAMBISAN

Pages:256

MRP:Rs.325/-

Stock:In Stock

Rs.325/-

Details

यह एक म्लान सुबह थी। जहाँ तक मुझे याद है, हाल के वर्षों में इतनी कड़ाके की सर्दी शायद ही कभी पड़ी थी। और, मैं सोच रहा था कि अगर घड़ियाँ तेरह नहीं बजा रही थीं तो इसका कारण बस यही था कि कहीं कोई घड़ी थी ही नहीं। मैं अस्पताल के मुख्य फाटक के बाहर खड़ा किसी रिक्शे की बाट देख रहा था। आम तौर पर 8ः30 बजे मरीज लोग रेलवे स्टेशन में यहाँ पहुँचना शुरू हो जाते थे। लेकिन, आज शायद वे ठंड के मारे नहीं आ पाये थे। बहरहाल, फाटक के ठीक बाहर बैठने वाला फल-विक्रेता अपने ठिए पर आकर जम चुका था। ”रिक्शा चाहिए?“ वह बोला, ”मैं ले आता हूँ।“ यह कहकर वह उठा और उस गड्ढेदार सड़क पर चल पड़ा जो रेल की पटरियों से होती हुई एक किलोमीटर दूर लगने वाले बाजार तक जाती है। यह सड़क कभी पक्की हुआ करती थी, लेकिन बिहार की और बहुत-सी चीजों की तरह सालों से इसकी भी मरम्मत नहीं हुई थी।

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