VIKAS KA SAMAJSHASTRA

Format:Hard Bound

ISBN:81-7055-471-3

Author:SHYAMA CHARAN DUBE

Pages:184

MRP:Rs.300/-

Stock:In Stock

Rs.300/-

Details

पिछले कुछ वर्षों से विकास और आधुनिकीकरण की हवा दुनिया-भर में अन्धड़ का रूप धारण किए हुए है। उससे उड़ती हुई गर्दो-गुबार आज आँखों तक ही नहीं, दिलो-दिमाग तक भी जा पहुँची है। ऐसे में जो मनुष्योचित और समाज के हित में है, उसे देखने, महसूसने और उस पर सोचने का जैसे अवसर ही नहीं है। मनुष्य के इतिहास में यह एक नया संकट है, जिसे अपनी मूल्यहंता विकास-प्रक्रिया के फेर में उसी ने पैदा किया है। यह स्थिति अशुभ है और इसे बदला जाना चाहिए। लेकिन वर्तमान में इस बदलाव को कैसे सम्भव किया जा सकता है या उसके कौन-से आधारभूत मूल्य हो सकते हैं, यह सवाल भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना कि बदलाव। कहना न होगा कि सुप्रतिष्ठित समाजशास्त्री डॉ. श्यामाचरण दुबे की यह कृति इस सवाल पर विभिन्न पहलुओं से विचार करती है।

Additional Information

No Additional Information Available

About the writer

SHYAMA CHARAN DUBE

SHYAMA CHARAN DUBE प्रो. श्यामाचरण दुबे का जन्म मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में 1922 में हुआ । उनकी गिनती भारत के अग्रणी समाज वैज्ञानिकों में होती है । उनकी अन्तर्राष्ट्रीय पहचान 1955 में ‘इंडियन विलेज’ के प्रकाशन से बनी । उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानों के अतिरिक्त मानद उपाधियों से समादृत किया गया है । भारत की जनजातियों और ग्रामीण समुदायों पर उनकी पुस्तकों को बहुत आदर से पढ़ा जाता है । उनकी कई पुस्तकों के अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं । हिन्दी साहित्य में उनकी बहुत गहरी रुचि रही है और वे जीवनपर्यन्त भारत के कई शीर्षस्थ सम्मानों की प्रवर समितियों से भी जुड़े रहे हैं । हिन्दी में उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं ‘मानव और संस्कृति’, ‘परम्परा और इतिहास-बोध’, ‘संस्कृति तथा शिक्षा’, समाज और भविष्य’, ‘भारतीय ग्राम’, ‘संक्रमण’ की पीड़ा’, ‘विकास का समाजशास्त्र’ और ‘समय और संस्कृति’ ।

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality