VISHNUBHAT KI AATMKATHA

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-636-9

Author:MADHUKAR UPADHYAYA

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MRP : Rs. 300/-

Stock:In Stock

Rs. 300/-

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विष्णुभट्ट की आत्मकथा

Additional Information

1857 का विद्रोह उतना सीमित और संकुचित नहीं था, जैसा उसे अंग्रेज़ों द्वारा पेश किया गया। वह मात्र सिपाही विद्रोह नहीं था। उसमें जनभागीदारी थी। केवल सिपाही विद्रोह होता तो ‘रोटी-सन्देश’ कैसे फैलता। विद्रोहियों का कूट वाक्य ‘सितारा गिर पड़ेगा’ एक से दूसरी जगह कैसे पहुँचता। यह सन्देश कि सब लोग अंग्रेज़ों के खिलाफ़ खड़े हो जाएँ। सन्देश का रास्ते के सभी गाँवों में वांछित असर होता। जिस गाँव रोटी पहुँचती, पाँच रोटियाँ बनाकर अगले गाँवों के लिए रवाना कर दी जातीं। एक तथ्य यह भी है कि रोटी एक रात में सवा तीन सौ किलोमीटर दूर के गाँव तक पहुँच जाती थी। अंग्रेज़ों से सभी त्रस्त और परेशान थे। सिपाही विद्रोह ने उन्हें एकजुट होने का मौका दे दिया। अंग्रेजों से आज़ादी की उम्मीद जगा दी। सम्भव है विद्रोह में शामिल विभिन्न समुदायों के कारण अलग-अलग रहे हों। लक्ष्य एक था। उसमें धर्म, अर्थव्यस्था, खेती, समाज और रियासतदारी सब शामिल थी। अलगाव नहीं था बल्कि साझा सपना था। लोग जुड़ते चले गये।

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