HAMARE LOKPRIYA GEETKAR SHIV BAHADUR SINGH BHADAURIYA

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-538-9

Author:SHERJUNG GARG

Pages:114

MRP:Rs.150/-

Stock:In Stock

Rs.150/-

Details

मेरे निकट कविताएँ भूख-प्यास और नींद की तरह अपने आप आयी हैं। ख्याति प्राप्त कितने ही अग्रज कवियों एवं साहित्यकारों का स्नेह तथा समसामयिक साहित्यकारों की मैत्री का सौभाग्य मुझे प्राप्त है, किन्तु मेरी कोई संस्था नहीं है, न कोई संगठन। न किसी काव्यान्दोलन का जन्मदाता हूँ और न किसी का झंडाबरदार। एक सान्ध्य दीप की तरह संघर्षों की नदी को बहाने में -कभी साथ, कभी अकेले बहने में मुझे अच्छा लगता है। कितना रास्ता कटा या कितना अँधेरा छँटा इसका लेखा-जोखा कम रखता हूँ। साक्षी मात्र हूँ संघर्षों का और इसके अतिरिक्त जो कविता हो सकती थी-वह मैंने नहीं लिखी। मैं किसी की स्थूल प्रतिक्रिया नहीं हूँ, यह कहने का साहस मुझमें है।

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About the writer

SHERJUNG GARG

SHERJUNG GARG डॉ गर्ग का जन्म 29 मई, 1937 को देहरादून में हुआ। हिन्दी में व्यंग्य-ग़ज़लें और इनका शोध-प्रबंध 'स्वातंत्र्‌योत्तर हिन्दी-कविता में व्यंग्य' चर्चित रहे। 'बाज़ार से गुज़रा हूं', 'दौरा अंतर्यामी का', 'क्या हो गया कबीरों को' और 'रिश्वत-विषवत' डॉ गर्ग की प्रमुख व्यंग्य-कृतियां हैं।

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