SUKHAN SARAI

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-253-4

Author:MUNAWWAR RANA

Pages:102

MRP:Rs.125/-

Stock:In Stock

Rs.125/-

Details

शिकस्तो-रेख़्त की मनाजिल से गगुज़रकर जो ग़जल नमूदार हुई वो ज़िन्दगी से बहुत करीब थी। ग़ज़ल के इस बदले हुए मिजाज़ को जिन शायरों ने समझा और बरता उनमें मुनव्वर राना को इम्तियाजी हैसियत हासिल है। उनकी शायरी न सिर्फ जिन्दगी के तमाम दीगर मुआमलात व मसाइल का एहाता करती है बल्कि वो इंसानी रिश्तों की हकीकत , लताफत व नजाकत और पकिजगीयों का इदराक भी रखती है। उसमें जज़्बों की आँच, मुहब्बत का वज़्दान और रिवायत व अकदार की पासदारी की जुस्तुजू है। मुनव्वर राना का पैकर हकीकत उनकी शायरी का आईनादार है जिसने इस वहम को बहुत हद तक दूर कर दिया है कि उर्दू शायरी सिर्फ हुस्न और इश्क गिर्द चक्कर लगाती रहती है और ‘साहिर’ के इस मिसरे की तस्दीक करती है ‘और भी ग़म है ज़माने में मुहब्बत के सिवा’।

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About the writer

MUNAWWAR RANA

MUNAWWAR RANA मुनव्वर राना का जन्म 26 नवम्बर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था। सैयद मुनव्वर अली राना यूँ तो बी. कॉम. तक ही पढ़ पाये किन्तु ज़िन्दगी के हालात ने उन्हें ज्यादा पढ़ाया भी उन्होंने खूब पढ़ा भी। माँ, ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, मोर पाँव, सब उसके लिए, बदन सराय, घर अकेला हो गया, मुहाजिरनामा, सुखन सराय, शहदाबा, सफ़ेद जंगली कबूतर, फुन्नक ताल, बग़ैर नक़्शे का मकान, ढलान से उतरते हुए और मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें हिन्दी व उर्दू में प्रकाशित हुईं। कई किताबों का बांग्ला व अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।

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