Bazar Ke Beech: Bazar Ke Khilaph

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-175-8

Author:Prabha Khaitan

Pages:244

MRP:Rs.300/-

Stock:Out of Stock

Rs.300/-

Details

सारी दुनिया में स्त्री के जीवन पर भूमंडलीकरण के प्रभाव बहुमुखी, लेकिन विरोधाभासी हैं। राष्ट्र बनाम भूमंडलीकरण या फिर बाजार बनाम समाज जैसे सरलीकरणों पर सवार होकर स्त्री की आजादी के पैरोकार इन प्रभावों का आकलन नहीं कर सकते। अगर भूमंडलीकरण से पहले का जमाना पितृसत्ता का था, तो यह जमाना भी पितृसत्ता का ही है। भूमंडलीकरण की प्रक्रियाएँ इतने स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं हुआ करतीं, और न ही उनका स्त्री-जीवन पर केवल निषेधक प्रभाव ही पड़ता है। इसीलिए भूमंडलीकरण के खिलाफ एकतरफा फैसला देना जल्दबाजी होगी। पूँजीवाद की ओर अग्रसर होते हुए तीसरी दुनिया के देशों में स्त्री की जो पहचान उभरती है, वह पश्चिमी नकल भर नहीं है। आधुनिक विमर्श में हिस्सेदारी कर रही स्त्री को एक सीमा तक अपना आलोचनात्मक रवैया बनाने में सफलता मिली है।

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About the writer

Prabha Khaitan

Prabha Khaitan जन्म: 1 नवम्बर, 1942 शिक्षा: एम.ए. पी-एच.डी. (दर्शनशास्त्र) प्रकाशित कृतियाँ उपन्यास: आओ पेपे घर चलें !, छिन्नमस्ता, पीली आँधी, अग्निसंभवा, तालाबंदी, अपने-अपने चेहरे। कविता: अपरिचित उजाले, सीढ़ियाँ चढ़ती हुई मैं, एक और आकाश की खोज में, कृष्ण धर्मा मैं, हुस्न बानो और अन्य कविताएँ, अहल्या। चिंतन: उपनिवेश में स्त्री, सार्त्र का अस्तित्ववाद, शब्दों का मसीहा: सार्त्र, अल्बेयर कामू: वह पहला आदमी। अनुवाद: साँकलों में कैद कुछ क्षितिज (कुछ दक्षिण अफ्रीकी कविताएँ), स्त्री: उपेक्षिता (सीमोन द बोउवार की विश्व-प्रसिद्ध कृति ‘द सेकंड सेक्स’)। संपादन: एक और पहचान, ‘हंस’ का स्त्री विशेषांक भूमंडलीकरण: पितृसत्ता के नये रूप। निधन: 20 सितम्बर, 2008।

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