MATSYAGANDHA

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-779-2

Author:NARENDRA KOHLI

Pages:

MRP:Rs.300/-

Stock:Out of Stock

Rs.300/-

Details

सत्यवती के मुँह से जैसे अनायास ही निकल गया, ''मैं निषाद-कन्या ही हूँ तपस्वी ! मत्स्यगन्धा हूँ मैं । मेरे शरीर से मत्स्य की गन्ध आती है ।" तपस्वी खुल कर हँस पड़ा और उसने जैसे स्वत:चालित ढंग से सत्यवती की बाँह पकड़ कर उसे उठाया, "मछलियों के बीच रह कर, मत्स्यगन्धा हो गई हो पर हो तुम काम-ध्वज की मीन ! मेरे साथ आओ। इस कमल-वन में विहार करो और तुम पद्म-गन्धा हो जाओगी।" दोनों द्वीप पर आये और बिना किसी योजना के अनायास ही एक-दूसरे की इच्छाओं को समझते चले गये/ तपस्वी इस समय तनिक भी आत्मलीन नहीं था । उसका रोम-रोम सत्यवती की ओर उन्मुख ही नहीं था, लोलुप याचक के समान एकाग्र हुआ उसकी ओर निहार रहा था । सत्यवती को लग रहा था, जैसे वह मत्स्यगन्धा नहीं, मत्स्य-कन्या है । यह सरोवर ही उसका आवास है । चारों ओर खिले कमल उसके सहचर हैं । पृष्ठ संख्या 21 से " सत्यवती को विश्वास नहीं हुआ था । पिता के दूसरे विवाह से देवव्रत को ऐसा कौन-सा लाभ होने जा रहा था, जिसके लिए देवव्रत ने आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा कर ली थी ? यह प्रतिज्ञा पिता को प्रसन्न करने के लिए ही तो की थी न । पर, पिता को प्रसन्न करके क्या मिलेगा देवव्रत को- राज्य ही तो ? पर वही राज्य त्यागने की प्रतिज्ञा का ली है उन्होंने । केवल राज्य ही नहीं- स्त्री-सुख भी । क्यों की यह प्रतिज्ञा ? इससे देवव्रत को कौन-सा सुख मिलेगा ?"

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About the writer

NARENDRA KOHLI

NARENDRA KOHLI नरेन्द्र कोहली का जन्म 6 जनवरी 1940, सियालकोट ( अब पाकिस्तान ) में हुआ । दिल्ली विश्वविद्यालय से 1963 में एम.ए. और 1970 में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की । शुरू में पीजीडीएवी कॉलेज में कार्यरत फिर 1965 से मोतीलाल नेहरू कॉलेज में । बचपन से ही लेखन की ओर रुझान और प्रकाशन किंतु नियमित रूप से 1960 से लेखन । 1995 में सेवानिवृत्त होने के बाद पूर्ण कालिक स्वतंत्र लेखन। कहानी¸ उपन्यास¸ नाटक और व्यंग्य सभी विधाओं में अभी तक उनकी लगभग सौ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनकी जैसी प्रयोगशीलता¸ विविधता और प्रखरता कहीं और देखने को नहीं मिलती। उन्होंने इतिहास और पुराण की कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखा है और बेहतरीन रचनाएँ लिखी हैं। महाभारत की कथा को अपने उपन्यास "महासमर" में समाहित किया है । सन 1988 में महासमर का प्रथम संस्करण 'बंधन' वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था । महासमर प्रकाशन के दो दशक पूरे होने पर इसका भव्य संस्करण नौ खण्डों में प्रकाशित किया है । प्रत्येक भाग महाभारत की घटनाओं की समुचित व्याख्या करता है। इससे पहले महासमर आठ खण्डों में ( बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध) था, इसके बाद वर्ष 2010 में भव्य संस्करण के अवसर पर महासमर आनुषंगिक (खंड-नौ) प्रकाशित हुआ । महासमर भव्य संस्करण के अंतर्गत ' नरेंद्र कोहली के उपन्यास (बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध,आनुषंगिक) प्रकाशित हैं । महासमर में 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' के बारे में वर्णन है, लेकिन स्त्री के त्याग को हमारा पुरुष समाज भूल जाता है।जरूरत है पौराणिक कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझा जाये। इसी महासमर के अंतर्गततीन उपन्यास 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' हैं जो स्त्री वैमर्शिक दृष्टिकोण से लिखे गये हैं ।

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