ZINDA BAHAR

Format:Hard Bound

ISBN:81-7055-451-0

Author:FAHMIDA RIYAZ

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MRP:Rs.100/-

Stock:Out of Stock

Rs.100/-

Details

...बात सिर्फ़ इतनी-सी है कि दिसम्बर 1989 के खुशगवार महीने में मैं यानी राक़िमुलहुरूफ (इन शब्दों की लेखिका) ढाका गई थी। मैं पहली बार ढाका गई थी। सफ़र पर रवाना होते हुए मुझे इस बात का अफ़सोस था कि क्यों मैं पहली बार जा रही हैं। दरअसल ये एक इन्तिहाई ताख़ीर-ज़दा (अत्यधिक देर से होने वाला) सफ़र था। बरसों पहले जब मैं हैदराबाद (सिन्ध) के एक कॉलेज़ में पढ़ती थी, तो तालिबात (विद्यार्थियों) का एक दस्ता, जिसमें मैं भी शामिल थी, उस वक्त के मश्रिकी (पूर्वी) पाकिस्तान जानेवाला था। उस ज़माने में कौमी यकजहती (राष्ट्रीय एकता) के लिए तुल्बा के वक़्त (विद्यार्थियों के प्रतिनिधि मण्डल) मुल्क के दोनों हिस्सों में आते-जाते थे। लेकिन ऐन वक़्त पर ढाका यूनिवर्सिटी में हड़ताल हो गई थी, शहर का नज्मो-नसकु (कानून-व्यवस्था) दिगरगूं (अस्त-व्यस्त हो गया था, और हमारा सफ़र मुल्तवी हो गया था, हमेशा के लिए मुल्तवी। लेकिन मेरा मलाल कभी मादूम (धूमिल) नहीं हुआ था। और इस बार मुझे यही महसूस हो रहा था कि दरअसल वो मुल्तवीशुदा सफ़र अब हो रहा है। जिसे, जहाँ तक मुझे याद पड़ता है सन् पैंसठ में होना था। इस अरसे में क्या-कुछ हो गया। 1971 में, बंगाल की जो तस्वीर मेरे दिमाग में थी, उस पर अचानक बहुत-सा खून गिर पड़ा था। ये सुख-सुख़ (लाल-ही-लाल) हो गई थी। एक खून में भीगी हुई तस्वीर! फिर भी तस्वीर तो वही थी-बंगाल...सो तो किसी सियाह आँख का ख़्वाब था। दराज़, सियाह गेसुओं की खुशबू, भटियाली की पुरसोज़ (मार्मिक) तान, जो अज़ल (आदिकाल) से अबद (सृष्टि के अन्त) तक बहते पानी पर लहरा रही थी। बंगाल...जैनुलआबिदीन के मूक़लम (तपस्वियों की तूलिकाओं) के सरसराते खुतूत और ‘नज्रलइस्लाम और ‘टैगोर की शायरी। आप बंगाल से क्योंकर (किस तरह) प्यार न करेंगे? क्योंकर इस पर आशिक न रहेंगे? एक रूमानी, जज़्बाती, उर्दू की शायर होने के नाते बंगाल से बहुत प्यार करते रहना मेरे लिए नागुज़ीर (अनिवार्य) था। एक ऐसी बात जोकि ज़ाहिर है, होनी ही थी। जबकि बंगाल से मुहब्बत करने के लिए तो आपका जज़्बाती, रूमानी या शायर होना तक ज़रूरी नहीं। (इसी पुस्तक से)

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About the writer

FAHMIDA RIYAZ

FAHMIDA RIYAZ फ़हमीदा रियाज़ पाकिस्तानी शायरा फ़हमीदा रियाज़ उर्दू की बहुचर्चित हस्ती हैं। कविता, नज़्म आदि के अलावा इन्होंने काफ़ी संख्या में कहानियाँ भी लिखी हैं। प्रायः भारत आती रहती हैं। जियाउलहक़ के सैनिक प्रशासन के दौरान फैज अहमद फैज की तरह इन्होंने भी काफी समय तक भारत में शरण ली थी।

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