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Original Book/Language: बांग्ला भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित. अनुवादक – सुशील गुप्ता

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-8143-670-2

Author:MAHASHWETA DEVI

Translation:...तस्वीर? कोई तस्वीर नहीं है। पटना के जनसेवा अनाथ आश्रम का जो लड़का, आदिवासी छात्रवृत्ति लेकर, धनबाद कॉलेज़ में पढ़ने गया था, उस वक़्त की एक ग्रुप तस्वीर कहीं जरूर रखी है! लेकिन उस तस्वीर में, आज के हीरो को पहचानना नामुमकिन है। उसका तो फिंगर प्रिंट तक नहीं मेल खाता। लालपुर पुलिस ने उसकी उंगलियों की छाप ली जरूर थी, लेकिन जौरवाली में हरिजन बस्ती में लगी आग बुझाते हुए, उसकी हथेली ही जल गई। हाथ में पैसा आने के बाद, बाएं और दाहिने हाथ की प्लास्टिक सर्जरी कराई गई। जी नहीं, वह अँगूठा छाप नहीं था। किसी भी जन-बहुल शहर में, किसी को भी, कहीं भी गुम हो जाने की कतई मनाही नहीं है। अगर वह मर भी जाए तो लाश, बिना शिनाख्त के ही पड़ी रहेगी। इतने साल बाद, यह सब सोचने बैठो, तो कहीं से असहाय होने का अहसास तो होता ही है... - इसी उपन्यास से

Pages:96


MRP : Rs. 125/-

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Details

बांग्ला भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित. अनुवादक – सुशील गुप्ता

Additional Information

...तस्वीर? कोई तस्वीर नहीं है। पटना के जनसेवा अनाथ आश्रम का जो लड़का, आदिवासी छात्रवृत्ति लेकर, धनबाद कॉलेज़ में पढ़ने गया था, उस वक़्त की एक ग्रुप तस्वीर कहीं जरूर रखी है! लेकिन उस तस्वीर में, आज के हीरो को पहचानना नामुमकिन है। उसका तो फिंगर प्रिंट तक नहीं मेल खाता। लालपुर पुलिस ने उसकी उंगलियों की छाप ली जरूर थी, लेकिन जौरवाली में हरिजन बस्ती में लगी आग बुझाते हुए, उसकी हथेली ही जल गई। हाथ में पैसा आने के बाद, बाएं और दाहिने हाथ की प्लास्टिक सर्जरी कराई गई। जी नहीं, वह अँगूठा छाप नहीं था। किसी भी जन-बहुल शहर में, किसी को भी, कहीं भी गुम हो जाने की कतई मनाही नहीं है। अगर वह मर भी जाए तो लाश, बिना शिनाख्त के ही पड़ी रहेगी। इतने साल बाद, यह सब सोचने बैठो, तो कहीं से असहाय होने का अहसास तो होता ही है... - इसी उपन्यास से

About the writer

MAHASHWETA DEVI

MAHASHWETA DEVI बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 1926 में ढाका में हुआ। वह वर्षों बिहार और बंगाल के घने कबाइली इलाकों में रही हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रामाणिकता के साथ उभारा है। महाश्वेता देवी एक थीम से दूसरी थीम के बीच भटकती नहीं हैं। उनका विशिष्ट क्षेत्र है-दलितों और साधन-हीनों के हृदयहीन शोषण का चित्रण और इसी संदेश को वे बार-बार सही जगह पहुँचाना चाहती हैं ताकि अनन्त काल से ग़रीबी-रेखा से नीचे साँस लेनेवाली विराट मानवता के बारे में लोगों को सचेत कर सकें। गैर-व्यावसायिक पत्रों में छपने के बावजूद उनके पाठकों की संख्या बहुत बड़ी है। उन्हें साहित्य अकादेमी, ज्ञानपीठ पुरस्कार व मैग्सेसे पुरस्कार समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

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