ALAKNANDA

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-914-7

Author:NANDKISHOR NAUTIYAL

Pages:332

MRP:Rs.495/-

Stock:Out of Stock

Rs.495/-

Details

अलकनंदा

Additional Information

लगता है कि आज भी अलकनंदा, भागीरथी, भिलंगना, मंदाकिनी, पिंडरी, नंदाकिनी, यमुना, टौंस, कोसी, सरयू, रामगंगा आदि अमृतवाहिनी-मोक्षदायिनी नदियाँ किन्हीं राजाओं की ही अतृप्त आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए श्रम और साधन की गंगा बनकर मैदानों की ओर ही बही चली जा रही हैं...कभी वापस न लौटने के लिए! साथ में बहाये ले जा रही हैं पर्वतों का सीना छीलकर उनकी माटी, उनके पुत्रों की मेहनत और मति! अलकनंदा के पात्र पिछले साठ-सत्तर वर्षों के काल-कैनवस के होते हुए भी उत्तराखंड के दस बरस के क़िस्से को केवल बीस दिन की यायावरी में कह देते हैं। यह इस तथ्य का भी जीवंत उदाहरण है कि उत्तराखंड इतने बरसों में न सिर्फ़ ठहर गया है, बल्कि लगातार नीचे की ओर लुढ़कता ही जा रहा है। इस कहानी में मैं अकेला नहीं, इसमें हम सब हैं। उत्तराखंड की त्रासद पीड़ा सिर्फ़ उत्तराखंड की नहीं है। यह देश के हर उस क्षेत्र की पीड़ा है, जो उपेक्षित है और पिछड़ा रहने के लिए अभिशापित है-वह चाहे रेगिस्तानी हो मैदानी हो पहाड़ी हो या वनखंडी!

About the writer

NANDKISHOR NAUTIYAL

NANDKISHOR NAUTIYAL नौटियाल हिन्दी भाषा आंदोलन के एक सक्रिय कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) नंदकिशोर नौटियाल ने बयासी की दहलीज़ पार कर ली है। वह पत्रकारों की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं, जिसके लिए पत्रकारिता एक मिशन रही है। इसलिए पत्रकारिता के साथ-साथ सामाजिक दायित्व और राजनीतिक वैचारिकता को उन्होंने पूरे प्राणपण के साथ निभाया। 15 जून, 1931 को पं. ठाकुर प्रसाद नौटियाल के घर आज के उत्तराखंड राज्य में पौड़ी गढ़वाल जिले के एक छोटे से पर्वतीय गाँव मश्नाग्राम में जन्मे नंदकिशोर नौटियाल ने माँ श्रीमती सौभाग्यवती देवी के साथ रहते हुए गाँव के स्कूल से चौथी पास की और आगे की शिक्षा के लिए पिता के पास दिल्ली चले गये, जो वहाँ नौकरी करते थे। सन 1942 के उन दिनों की स्वराज की गाँधी-नेहरू लहर ने छात्र-जीवन की छोटी उम्र में ही उन्हें स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रभाव में ले लिया। 1946 में बंगलोर में हुए छात्र कांग्रेस के 'अखिल भारतीय सम्मेलन' में भाग लिया। 1946 में ही नौसेना विद्रोह के समर्थन में देशव्यापी 'जेल भरो' आन्दोलन में गिरफ़्तार हुए। 1947-48 में साम्प्रदायिक दंगों में राहत-कार्य किया और '48 में ही पत्रकारिता से जुड़े। 1949 से 1951 तक नवभारत साप्ताहिक (मुम्बई), दैनिक लोकमान्य (मुम्बई) और लोकमत (नागपुर), पत्रिका 'सरिता', 'नयी कहानियाँ', 'मज़दूर जनता' और 'हिन्दी टाइम्स' (दिल्ली) के लिए कार्य किया। दिल्ली में 'पर्वतीयजन', 'हिमालय टाइम्स' निकाला। नौटियालजी धीरे-धीरे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ़ आकृष्ट होते गये और 1954 से '57 तक दिल्ली में सीपीडब्ल्यूडी वर्कर्स यूनियन के सचिव रहे और कई मज़दूर संगठन बनाये. साथ ही पत्रकार संगठनों में सक्रिय रहे। गोवा मुक्ति संग्राम में भाग लिया।

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