AGYEYA AUR POORVOTTAR BHARAT

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-732-7

Author:RITARANI PALIWAL

Pages:

MRP:Rs.200/-

Stock:In Stock

Rs.200/-

Details

यह लेखन अज्ञेय की पूर्वोत्तर भारत की यात्राओं और प्रवास से जुड़ा है। अज्ञेय द्वारा की गयी यह पहल कितनी महत्त्वपूर्ण है यह बात आज हम आसानी से समझ सकते हैं। आज सभी महसूस कर रहे हैं कि पूर्वोत्तर राज्यों की ओर खास तौर पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ऐसा अब तक न किये जाने का परिणाम यह हुआ है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों ने अपने को उपेक्षित और अलग-थलग महसूस किया है और पूर्वोत्तर की समस्याएँ सुलझने की बजाय उलझती गयी हैं। छह दशक पहले अज्ञेय द्वारा प्रस्तुत पूर्वोत्तर सीमा प्रान्त की ये झाँकियाँ उन इलाकों की जातीय संवेदना से हमारा साक्षात्कार कराती हैं। प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास, पुराण, मिथक साहित्य और लोक-विश्वासों के बीच भारत के सांस्कृतिक भूगोल की तलाश इन यात्रा-वृत्तान्तों और कहानियों का एक मूल्यवान पहलू है। दूसरी ओर आधुनिक समय के ज्वलंत प्रश्नोंµउपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद; जनजाति बनाम मूलधारा; मनुष्य, प्रकृति और वन्य जीवन के बीच सम्बन्ध और साहचर्य; महायुद्धµमहाशक्तियों के संघर्षों के नीचे पिसता आम आदमी विशेष कर सीमाक्षेत्रों की औरतें; सैन्य जीवन की विडम्बनाएँ; मोर्चे पर तैनात सैनिकों का मानसिक, भावनात्मक अधःपतन; उनकी मानसिक-शारीरिक समस्याएँ; शौर्य और पराक्रम की छलनाएँµपूर्वोत्तर केन्द्रित इन कहानियों और यात्रा संस्मरणों में अन्तरंग मानवीय पीड़ा बोध और सहानुभूति के साथ मौजूश्द है। स्वाभाविक ही था कि युद्ध से जुड़े अँधेरे पक्ष की ओर रचनाकार का ध्यान जाता। अज्ञेय की पूर्वोत्तर से जुड़ी कहानियाँ सैन्य जीवन से जुड़ी सामाजिक और वैयक्तिक विडम्बनाओं को उजागर करती हैं; मनुष्यता के अवमूल्यन के विभिन्न रूपों को उद्घाटित करती हैं। पचास के दशक तक हिन्दी में इस तरह की संवेदना की अभिव्यक्ति सम्भवतया एक पहल ही थी बहुत कुछ लेखक के अपने सैन्य सेवा के अनुभवों पर आधारित। मुक्तिबोध और अज्ञेय दोनों ने साहित्य को एक सांस्कृतिक प्रक्रिया माना है तो इसलिए साहित्य देशकाल की सीमाओं का अतिक्रमण करता हुआ हमारी संवेदना का विस्तार करता है। परम्परा की निरन्तरता को पहचानने और उसके बीच अपने तथा दूसरों के होने से जुड़े विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है। अज्ञेय का पूर्वोत्तर विषयक यह लेखन स्थानीय जीवन, प्रकृति, मिथक और जातीय सामूहिक अवचेतन की दृष्टि से प्राचीन और नवीन का एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक अध्ययन है।

Additional Information

इस पुस्तक की सामग्री अज्ञेय की पूर्वोत्तर भारत की यात्राओं और प्रवास से सम्बन्धित है। अज्ञेय द्वारा की गई यह पहल कितनी महत्त्वपूर्ण है यह बात आज हम आसानी से समझ सकते हैं। आज सभी महसूस कर रहे हैं कि पूर्वोत्तर राज्यों की ओर ख़ास तौर पर ध्यान देना चाहिए। अब तक ऐसा न किए जाने का परिणाम यह हुआ है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों ने अपने को उपेक्षित और अलग-थलग महसूस किया है और पूर्वोत्तर की समस्याएँ सुलझने की बजाय उलझती गयी हैं। छह दशक पहले अज्ञेय द्वारा प्रस्तुत पूर्वोत्तर सीमा प्रान्त की ये झाँकियाँ उन इलाकों की जातीय सम्वेदना से हमारा साक्षात्कार कराती हैं। 'अज्ञेय और पूर्वोत्तर भारत' अज्ञेय जन्मशती के अवसर पर वाणी प्रकशन की ख़ास प्रस्तुति है जिसमें इस विषय से जुड़ी अज्ञेय की कहानियों और निबन्धों को सम्पादित किया गया है।

About the writer

RITARANI PALIWAL

RITARANI PALIWAL जन्म: 3 सितम्बर 1949, खैरगढ़, ज़िला - मैनपुरी (उत्तर प्रदेश)। शिक्षा: हिन्दी और अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद नाटक और रंगमंच पर हिन्दी में पीएच.डी. और डी.लिट्. किया। जापान में रहते हुए जापानी नाटक और रंगमंच को देखने-जानने-समझने का अवसर मिला। साहित्य, संस्कृति और समसामयिक विषयों पर पत्रिकाओं में लेखन। प्रमुख प्रकाशन: यूनानी और रोमी काव्यशास्त्र, रंगमंच और जयशंकर प्रसाद के नाटक, जयशंकर प्रसाद और मोहन राकेश की रंग-दृष्टि का तुलनात्मक अध्ययन, जापानी रंग-परम्परा: नोह, काबुकी और बुनाराकु, जापान के विविध रंग-राग, अज्ञेय के सृजन में जापान, अनुवाद की सामाजिक भूमिका, अनुवाद प्रक्रिया और परिदृश्य। प्रेमचन्द के उपन्यास कर्मभूमि का अंग्रेजी में अनुवाद, जापानी मन्योशु कविताओं का हिन्दी में अनुवाद। इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर तथा मानविकी विद्यापीठ की निदेशक रहीं। सम्प्रति: सस्ता साहित्य मंडल की सदस्य सचिव।

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