AGYEYA KA KAVI KARM

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-152-0

Author:ED. RAMESH CHANDRA SHAH

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MRP:Rs.150/-

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‘‘हर कोई मेरा लिखा हुआ जरूर पढ़े ही, ऐसा मेरा कोई आग्रह नहीं है’’µ अज्ञेय का कहना था µ‘‘किन्तु हर कोई मेरा पाठक हो सकता है, ऐसा मैं मानता हूँ। ‘‘यह भी, कि... ‘‘मानव में मेरी श्रद्धा है। मानव-मात्रा को मैं अभिजात मानता हूँ।’’... इससे ज्यादा मुँहतोड़ जवाब भला और क्या हो सकता है उन लोगों को, जो एक लाइलाज लत की तरह इस ‘अभिजात’ शब्द का प्रयोग गाली की तरह अज्ञेय के विरुद्ध करते रहे हैं। अज्ञेय जन्म शतवार्षिकी आयोजन के सिलसिले में प्रस्तुत कवि-आलोचक रमेश चन्द्र शाह के ये आलेख अज्ञेय को लेकर उनके अद्यतन मूल्यांकनकारी उपक्रम कहे जा सकते हैं। इनमें खासी रीझ-बूझ और विश्लेषणात्मक अध्यवसाय के बूते यह दर्शाने का प्रयत्न किया गया है कि किस तरह अज्ञेय का काव्य-कृतित्व प्रसाद-युग से लेकर युवा कविता तक के विकास- क्रम को अपने में समेटे हुए है; और यह भी, कि पद्य और गद्य की सभी विद्याओं में फलता-फूलता अज्ञेय का अनूठा मानवनिष्ठ स्वातन्त्रय-दर्शन क्यों और किस तरह आज के भूमंडलीकृत विश्व में अपने देशवासियों को पूरे सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ नयी रचना करने की प्रेरणा देने वाला और सच्चे अर्थों में एक आत्म-वान् भारतीय आधुनिकता का पथ प्रशस्त करने वाला है। शाह के कथनानुसार अज्ञेय-काव्य की विशेषता ऐसी अनुभूतियों और प्रतीतियों को भी अभिव्यक्ति के दायरे में खींच लाने में निहित है जो हम सभी के जीवनानुभव में कुछ सार्थक जोड़ती हुई उसे समृद्ध करती है। किन्तु इसके साथ ही साथ अनुभव और अभिव्यक्ति कौशल दोनों के धनी इस कवि में एक अधूरेपन की कसक भी बराबर झलकती महसूस की जा सकती है: ‘‘है, बहुत कुछ और है, जो कहा नहीं गया...’’। अज्ञेय का कवि-कर्म शब्द-साधना और कर्म-साधना से ही नहीं, गहरे कहीं किसी ‘शब्दातीत अर्थ’ की प्रतीति से भी जुड़ा हुआ है, जो उत्तरोत्तर उनके यहाँ गहराती गयी है। ‘आलोचक राष्ट्र’ के निर्माण की संकल्पना अज्ञेय की आधुनिकता का पहला पड़ाव है। पर, शाह बलपूर्वक इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि संस्कृति के निर्माण की जिस चिर-जागरूक चेष्टा की वकालत अज्ञेय कर रहे हैं, वह अतीत से नहीं, भविष्य से जुड़ी है। तभी तो वे आधुनिकता की बात को हिन्दी की बात बनाकर ही आत्मविश्वासपूर्वक आधुनिक और प्रगतिशील होने का अर्थ समझाते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि हिन्दी अपने स्वभाव और स्वधर्म से ही आगे देखने वाली भाषा है।

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ED. RAMESH CHANDRA SHAH

ED. RAMESH CHANDRA SHAH रमेशचन्द्र शाह का जन्म (1937) अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में हुआ। आरम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.एससी. तथा आगरा से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1997 में भोपाल के हमीदिया महाविद्यालय से अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भोपाल स्थित ‘निराला सृजनपीठ’ के निदेशक रहे (दिसम्बर, सन् 2000 तक)। उपन्यास ‘पूर्वापर’ को भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता ने, ‘गोबरगणेश’ तथा काव्यकृति ‘नदी भागती आई’ को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् ने, आलोचना-पुस्तक ‘छायावाद की प्रासंगिकता’ को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् ने पुरस्कृत किया। उपन्यास ‘किस्सा गुलाम’ नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आठ भारतीय भाषाओं में अनूदित। निबन्ध-संग्रह ‘स्वधर्म और कालगति’ को मध्यप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार प्रदान किया गया। श्री शाह को सन् 1987-88 में मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग द्वारा ‘शिखर-सम्मान’ से सन् 2001 में के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा ‘व्यास-सम्मान’ से तथा सन् 2004 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ से अलंकृत किया जा चुका है। प्रकाशित कृतित्व: ‘रचना के बदले’, ‘शैतान के बहाने’, ‘आडई़ का पेड़’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ (निबन्ध-संग्रह); ‘कछुए की पीठ पर’, ‘हरिश्चन्द्र आओ’, ‘नदी भागती आई’, ‘प्यारे मुचकुन्द को’, ‘देखते हैं शब्द भी अपना समय’, चुनी हुई कविताओं का संकलन ‘चाक पर’ वाग्देवी प्रकाशन पॉकेट बुक संस्करण में उपलभ्य, तीन बाल कविता-संग्रह तथा दो बाल-नाटक भी (कविता-संग्रह); ‘गोबरगणेश’, ‘किस्सा गुलाम’, ‘पूर्वापर’, ‘आखिरी दिन’; ‘पुनर्वास’, ‘आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू’, ‘असबाब-ए-वीरानी’ (उपन्यास); ‘मुहल्ले का रावण’, ‘मानपत्रा’, ‘थिएटर’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘एक लम्बी छाँह’ (यात्रा-संस्मरण); ‘छायावाद की प्रासंगिकता’, ‘समानान्तर’, ‘वागर्थ’, ‘भूलने के विरुद्ध’, ‘अज्ञेय: वागर्थ का वैभव’, ‘अज्ञेय का कवि कर्म’, ‘आलोचना का पक्ष’, दो साहित्य अकादेमी मोनोग्राफ जयशंकर प्रसाद तथा अज्ञेय पर (समालोचना); ‘मेरे साक्षात्कार’ (साक्षात्कार); काव्यानुवादों की चार पुस्तिकाएँ ‘तनाव’ पुस्तकमाला के अन्तर्गत प्रकाशित। ‘राशोमन’ नाटक का अनुवाद ‘मटियाबुर्ज’ नाम से (अनुवाद)। सम्पादन: प्रसाद रचना-संचयन तथा अज्ञेय काव्य-स्तबक (साहित्य अकादेमी), निराला-संचयन (महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के लिए)। पता: एम-4, निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल (म.प्र.)।

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