SAMANA : RAMVILAS SHARMA KI VIVECHAN-PADDHATI AUR MARXWAAD

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ISBN:81-8143-348-3

Author:VEER BHARAT TALWAR

Pages:340

MRP:Rs.695/-

Stock:In Stock

Rs.695/-

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सामना

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वीर भारत तलवार ने हिन्दी आलोचना में अपने लिए अलग राह निकाली है। बड़े नामों से आतंकित हए बिना वे न सिर्फ़ उनकी स्थापनाओं से असहमति प्रकट करने का साहस रखते हैं बल्कि अपनी असहमति और अपनी स्थापनाओं को पूरे तथ्यों और तर्कों के साथ प्रमाणित भी करते हैं। उनके लेखों में जितनी गम्भीरता और ईमानदारी होती है, उतना ही अध्ययन और परिश्रम भी झलकता है। प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए वे मुद्दों की जड़ों तक जाते हैं, अपने विषय का दूर तक पीछा करते हैं। इस संकलन में शामिल रामविलास शर्मा पर लिखे गये लेख इसका जीवन्त उदाहरण हैं। हिन्दी में रामविलास शर्मा के भक्त तो कई हैं और विरोधी भी, लेकिन उनके विवेचन की बुनियादी खामियों को ठोस तथ्यों और तर्को से साबित करते हुए उजागर करने का काम वीर भारत ने ही किया है। यह ध्यान देने लायक है कि ऐसा करते हुए उन्होंने न तो रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व के प्रति अनादर भाव दिखलाया और न ही माक्सवाद का विरोध किया। उलटे ऐसा करते हुए उन्होंने माक्सवाद की मूल भावना को ही स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उनकी गम्भीर, विश्लेषणपरक आलोचना की यही विशेषता हजारीप्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, निर्मल वर्मा, हरिशंकर परसाई तथा दूसरों की आलोचना में भी दिखाई देती है। इससे बिल्कुल भिन्न किस्म का स्वाद उनके यात्रा संस्मरण चुनार के किले को पढ़कर मिलता है। ऐसा लालित्यबोध, तीव्र अनुभूतिशीलता, कल्पना की उड़ान और भाषा की सृजनात्मकता उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के एक बिल्कुल अलग, अनजाने पक्ष को सामने लाती है। सहृदय पाठक का ध्यान इन लेखों के साफ़-सुथरे, प्रभावशाली और पारदर्शी गद्य पर भी गये बिना नहीं रह सकता।

About the writer

VEER BHARAT TALWAR

VEER BHARAT TALWAR वीरभारत तलवार : 20 सितम्बर, 1947 को जमशेदपुर में लोहे के कारखाने में काम करने वाले एक शिक्षित मजदूर परिवार में जन्म। 1970 में हिन्दी एम.ए. बनारस हिन्दू वि.वि. से। 1984 में पीएच.डी. जे.एन.यू. से। 1970 का पूरा दशक नक्सलवादी आन्दोलन में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में धनबाद के कोयला खदान मजदूरों के बीच और फिर राँची-सिंहभूम के आदिवासियों के बीच काम किया। अलग झारखंड राज्य आन्दोलन के प्रमुख सिद्धान्तकार बने। इसी दौर में तीन राजनीतिक पत्रिकाओं का प्रकाशन-सम्पादन किया-फिलहाल (1972-74) पटना से, शालपत्र (1977-78) धनबाद से और झारखंड वार्ता (1977-78) राँची से। झारखंड : क्यूँ और कैसे? तथा झारखंड के आदिवासी और आर.एस.एस. नाम से दो लोकप्रिय राजनीतिक पैंफलेट लिखे। आदिवासी इलाकों में बड़े बाँधों के विकल्प पर शोध किया और राँची विश्वविद्यालय में आदिवासी भाषाओं के विभाग खुलवाने का आन्दोलन किया। 1988-89 में झारखंड के आदिवासियों द्वारा दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान भगवान विरसा पुरस्कार से सम्मानित किए गए। किताबें : किसान, राष्ट्रीय आन्दोलन और प्रेमचन्द : 1918-22, राष्ट्रीय नवजागरण और साहित्य : कुछ प्रसंग, कुछ प्रवृत्तियाँ, हिन्दू नवजागरण की विचारधारा : सत्यार्थप्रकाश : समालोचना का एक प्रयास। 1996 से 1999 तक भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, में फेलो। फिलहाल जे.एन.यू के भारतीय भाषा केन्द्र में एसोसिएट प्रोफ़ेसर।

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