PUNARPATH DIVYA

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-802-7

Author:YASHPAL

Pages:96

MRP:Rs.500/-

Stock:In Stock

Rs.500/-

Details

पुनरूपाठ दिव्या

Additional Information

“....आज की पुनर्पाठीय चेष्टाओं व पहले के प्रयासों में केवल समानता ही नहीं बल्कि बड़ी भिन्नताएँ भी हैं। पहले की पुनर्व्याख्याएँ वास्तविक व प्रामाणिक सत्य की तलाश करती थीं। उनका आग्रह मूल व प्रामाणिक की खोज पर रहता था। पर वर्तमान पुनपाठ ने मूल व प्रामाणिक की अवधारणा को ही चुनौती दे दी है। किसी केंद्रीय सत्य व मूल अर्थ की धारणा को अस्वीकार करने की प्रवृत्तियों का विकास हुआ है तथा व्याख्या के स्तर पर प्रामाणिक-अप्रामाणिक का भेद खत्म करने के किंचित बड़बोले पर आकर्षक दावे किए गए हैं। इसलिए पुनपाठ की वर्तमान पद्धति केवल पुरानी परंपरा के विकास को नहीं बल्कि वर्तमान परिवेश में ढेरों परिवर्तनों को भी सूचित करती है...”

About the writer

YASHPAL

YASHPAL यशपाल का जन्म 3 दिसम्बर, 1903 ई. में फ़िरोजपुर छावनी में हुआ था। इनके पूर्वज कांगड़ा ज़िले के निवासी थे और इनके पिता हीरालाल को विरासत के रूप में दो-चार सौ गज़ तथा एक कच्चे मकान के अतिरिक्त और कुछ नहीं प्राप्त हुआ था। आरंभिक शिक्षा स्थानीय स्कूल में और उच्च शिक्षा लाहौर में पाई। इनकी माँ प्रेमदेवी ने उन्हें आर्य समाज का तेजस्वी प्रचारक बनाने की दृष्टि से शिक्षार्थ गुरुकुल कांगड़ी भेज दिया। गुरुकुल के वातावरण में बालक यशपाल के मन में विदेशी शासन के प्रति विरोध की भावना भर गयी। यशपाल विद्यार्थी काल से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में जुट गए थे। अमर शहीद भगतसिंह आदि के साथ मिलकर इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। यशपाल की प्रमुख कृतियाँ: देशद्रोही, पार्टी कामरेड, दादा कामरेड, झूठा सच तथा मेरी, तेरी, उसकी बात (सभी उपन्यास), ज्ञानदान, तर्क का तूफ़ान, पिंजड़े की उड़ान, फूलो का कुर्ता, उत्तराधिकारी (सभी कहानी संग्रह) और सिंहावलोकन (आत्मकथा)। मेरी, तेरी, उसकी बात' पर यशपाल को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। यशपाल की कहानियों में सर्वदा कथा रस मिलता है। वर्ग-संघर्ष, मनोविश्लेषण और तीखा व्यंग्य इनकी कहानियों की विशेषताएँ हैं।

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