AADIVASI SWAR AUR NAI SHATABADI

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5229-695-8

Author:RAMNIKA GUPTA

Pages:324

MRP:Rs.225/-

Stock:In Stock

Rs.225/-

Details

स्त्रियों और दलितों का पक्ष लेने वाले लेखकों-संपादकों की संख्या बढ़ती जा रही हैं इसका एक कारण यह है कि इस क्षेत्र में नेतृत्व का स्थान लगभग खाली है। पर आदिवासियों को कोई नहीं पूछता क्यों वे राजधानियों में सहज सुलभ नहीं होते। उनकी सुध लेने के लिए उनके पास जाना पड़ेगा-कष्ट उठा कर। इसलिए वे उदाहरण देने और इतिहास की बहसों में लाने के लिए ही ठीक है। इस दृष्टि से रमणिका गुप्ता की तारीफ होनी चाहिए कि ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’ की थी पर एक उम्दा कृति दी है। विशेषता यह है कि एक नीतिगत फैसले के तहत हमने इस अंक में केवल वही रचनाएं ली हैं जो आदिवासी लेखकों द्वारा ही लिखी गयी हैं। फलतः आदिवासी मानसिकता की विभिन्न मुद्राओं को समझने का अवसर मिलता है। यह देख कर खुशी नहीं होती कि दलित साहित्य की तरह नये आदिवासी साहित्य में आक्रोश ही मुख्य स्वर बना हुआ है। जहां भी अन्याय है, आक्रोश का न होना स्वास्थ्यहीनता का लक्षण हैं। लेकिन साहित्य के और भी आयाम होते हैं, यह क्यों भुला दिया जाय? -राज किशोर

Additional Information

No Additional Information Available

About the writer

RAMNIKA GUPTA

RAMNIKA GUPTA रमणिका गुप्ता जन्म: 22 अप्रैल, 1930, सुनाम (पंजाब) शिक्षा: एम.ए., बी.एड. बिहार/झारखंड की पूर्व विधायक एवं विधान परिषद् की पूर्व सदस्य। कई गैर-सरकारी एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से सम्बद्ध तथा सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक कार्यक्रमांे में सहभागिता। आदिवासी, दलित महिलाओं व वंचितों के लिए कार्यरत। कई देशों की यात्राएँ। विभिन्न सम्मानों एवं पुरस्कारों से सम्मानित। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित कृतियाँ: निज घरे परदेसी, सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे (स्त्राी-विमर्श)। आदिवासी स्वर: नयी शताब्दी (सम्पादन)। इसके अलावा छह काव्य-संग्रह, चार कहानी-संग्रह एवं तैंतीस विभिन्न भाषाओं के साहित्य की प्रतिनिधि रचनाओं के अतिरिक्त ‘आदिवासी: शौर्य एवं विद्रोह’ (झारखंड), ‘आदिवासी: सृजन मिथक एवं अन्य लोककथाएँ’ (झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात और अंडमान-निकोबार) का संकलन-सम्पादन। अनुवाद: शरणकुमार लिंबाले की पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्रा’ का मराठी से हिन्दी में अनुवाद। इनके उपन्यास ‘मौसी’ का अनुवाद तेलुगु में ‘पिन्नी’ नाम से और पंजाबी में ‘मासी’ नाम से हो चुका है। ज़हीर गाजीपुरी द्वारा उर्दू में अनूदित इनका कविता-संकलन ‘कैसे करोगे तकसीम तवारीख को’ प्रकाशित। इनकी कविताओं का पंजाबी अनुवाद बलवरी चन्द्र लांगोवाल ने किया जो ‘बागी बोल’ नाम से प्रकाशित हो चुका है। आदिवासी, दलित एवं स्त्राी मुद्दों पर कुल 38 पुस्तकें सम्पादित। सम्प्रति: सन् 1985 से ‘युद्धरत आम आदमी’ (मासिक हिन्दी पत्रिका) का सम्पादन। सम्पर्क: ए-221, ग्राउंड फ्लोर, डिफेंस कॉलोनी, नयी दिल्ली-110024

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality